मनुष्य का अंतिम लक्ष्य ईश्वर की अनुभूति करना- मुक्तिनाथानन्द
गृहस्थ के लिए संसार का पूर्ण त्याग करना आवश्यक नहीं

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर प्राप्ति में आने वाली बधाओं को बताया गया। गुरुवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस का आध्यात्मिक जीवन त्याग, पवित्रता, ईश्वर-प्राप्ति और आत्मसंयम का अद्भुत उदाहरण है।
उनके अनुसार मनुष्य का अंतिम लक्ष्य ईश्वर की अनुभूति करना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मन को संसार के अनावश्यक आकर्षणों और आसक्तियों से मुक्त करना आवश्यक है।
विशेष रूप से संन्यासियों के लिए त्याग और कठोर अनुशासन का महत्व अत्यंत अधिक है। रामकृष्ण ने अपने जीवन में इन आदर्शों को केवल उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि व्यवहार में अपनाकर दिखाया।
स्वामी ने बताया आध्यात्मिक साधकों को मुख्य रूप से तीन वर्गों में समझा जा सकता है। युवा, गृहस्थ और संन्यासी। प्रत्येक की परिस्थितियाँ अलग हैं, इसलिए उनकी साधना का स्वरूप भी अलग हो सकता है।
युवावस्था में व्यक्ति पर संसार की जिम्मेदारियाँ अपेक्षाकृत कम होती हैं। इसलिए युवा साधक अपने मन और जीवन को आरंभ से ही उच्च आध्यात्मिक आदर्शों की ओर मोड़ सकता है। इस अवस्था में अच्छी संगति, आत्मसंयम, प्रार्थना, ध्यान और ईश्वर के प्रति प्रेम जीवन की मजबूत नींव बना सकते हैं।
गृहस्थ जीवन में व्यक्ति को परिवार, समाज और कार्यक्षेत्र की अनेक जिम्मेदारियाँ निभानी पड़ती हैं। इसलिए गृहस्थ के लिए संसार का पूर्ण त्याग करना आवश्यक नहीं है।
श्रीरामकृष्ण का संदेश है कि गृहस्थ अपनी जिम्मेदारियों का पालन करते हुए मन से आसक्ति का त्याग कर सकता है।
इसे मानसिक त्याग कहा जा सकता है। अर्थात व्यक्ति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाए, लेकिन धन, प्रतिष्ठा, संबंधों और भौतिक वस्तुओं को जीवन का अंतिम लक्ष्य न बनाए। संसार में रहते हुए भी मन को ईश्वर में लगाना गृहस्थ के लिए महत्वपूर्ण साधना है।
स्वामी ने कहा कि संन्यासी के लिए आदर्श और भी कठोर है। संन्यास का अर्थ केवल बाहरी वस्त्र बदल लेना नहीं, बल्कि जीवन के केंद्र को पूरी तरह ईश्वर की ओर मोड़ देना है।
संन्यासी से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने भीतर की आसक्ति, अहंकार, लोभ और इच्छाओं पर विजय प्राप्त करे। श्रीरामकृष्ण के शिक्षण में कामिनी-कांचन का त्याग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
यहाँ कामिनी-कांचन को केवल स्त्री और सोने के शाब्दिक अर्थ में नहीं, बल्कि इंद्रिय-आसक्ति, कामना, लोभ और धन के प्रति मोह के व्यापक प्रतीक के रूप में समझना चाहिए। ऐसी आसक्तियाँ मन को बाहरी संसार में बाँधती हैं और आध्यात्मिक साधना में बाधा उत्पन्न कर सकती हैं।
संन्यासी के लिए धन के प्रति अनासक्ति और संबंधों में अत्यंत सावधानी इसलिए आवश्यक मानी गई कि उसका जीवन व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और लोककल्याण के लिए समर्पित हो।
उसे अपने व्यवहार, विचार और आचरण में पवित्रता तथा संयम बनाए रखना चाहिए। रामकृष्ण स्वयं इस आदर्श के सर्वोच्च उदाहरण थे। उन्होंने अपने जीवन में पूर्ण त्याग, ईश्वर-प्रेम और आत्मसंयम को चरितार्थ करके दिखाया।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन केवल बाहरी रूप या वेश का नाम नहीं है। वास्तविक त्याग मन का त्याग है अहंकार, लोभ, मोह और अनावश्यक इच्छाओं से मुक्ति।
युवा अपने जीवन की दिशा सही कर सकते हैं, गृहस्थ मानसिक त्याग के साथ अपने कर्तव्यों का पालन कर सकते हैं और संन्यासी पूर्ण समर्पण तथा कठोर अनुशासन के माध्यम से ईश्वर-साक्षात्कार का प्रयास कर सकते हैं।
अंततः रामकृष्ण का जीवन यह विश्वास जगाता है कि उच्च आध्यात्मिक आदर्श केवल कल्पना नहीं, बल्कि सच्ची साधना, त्याग और आत्मसंयम से प्राप्त किए जा सकते हैं।



