उत्तर प्रदेशजीवनशैलीबड़ी खबर

नर्स गीता नवजातों शिशुओं की बनी पहली उम्मीद

नवजात शिशुओं की देखरेख में नर्सिंग स्टॉफ की अनुकरणीय भूमिका 

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। अस्पतालों में नवजात शिशुओं की देखरेख करने में नर्सिंग ऑफिसर की अहम् भूमिका मानी जाती है।

राजधानी के राम प्रसाद गुप्ता मदर एंड चाइल्ड स्टेट रेफरल अस्पताल के स्पेशल न्यूबॉर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू) में जब कोई नवजात जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा होता है, तब अक्सर सबसे पहले उसे संभालने वालों में स्टाफ नर्स गीता व उनकी टीम समर्पित हो जाती है।

कभी सांस नहीं ले पा रहा बच्चा, कभी बेहद कम वजन वाला नवजात, तो कभी जन्म के कुछ ही मिनटों में ब्लड शुगर गिरने से सुस्त पड़ चुका शिशु ऐसी हर इमरजेंसी में गीता और उनकी टीम बिना घबराए सबसे पहले बच्चे को संभालती है।

करीब 12 साल के नर्सिंग अनुभव वाली गीता 2017 से राम प्रसाद गुप्ता मदर एंड चाइल्ड स्टेट रेफरल अस्पताल के एसएनसीयू में तैनात हैं। उनके लिए यह सिर्फ नौकरी से जुड़ी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रतिबद्धता बन चुकी है।

पहले 30 सेकेंड तय करते हैं जिंदगी की दिशा

गीता बताती हैं। “जन्म के बाद शुरुआती 30 सेकेंड हमारे लिए सबसे ज्यादा नाजुक होते हैं। अगर बच्चा रो नहीं रहा, सांस लेने में दिक्कत है या शरीर ठंडा पड़ रहा है, तो उसी समय फैसला लेना पड़ता है कि क्या करना है। वार्म करना, ऑक्सीजन देना, मॉनिटर लगाना और शुगर चेक करना तुरंत शुरू हो जाता है।

उन्होंने बताया “ऐसे समय में पूरा ध्यान बच्चे को स्थिर करने पर होता है। अगर बच्चा प्रतिक्रिया नहीं दे रहा हो, तब भी हम घबराने या तनाव में आने की गुंजाइश नहीं रखते, क्योंकि ऐसी स्थिति में छोटी-सी गलती भी भारी पड़ सकती है।

हम शांत रहकर अपनी ट्रेनिंग, अनुभव और तय प्रोटोकॉल के अनुसार तुरंत कदम उठाते हैं। डॉक्टर के आने से पहले ही नर्सिंग स्टाफ बच्चे को स्थिर करने की प्रक्रिया शुरू कर देता है। जरूरत पड़ने पर एंबू बैग और सीपैप जैसे उपकरणों का इस्तेमाल भी किया जाता है।

मां का दर्द बना नवजात देखभाल का संकल्प

आज गीता जिस सहजता से प्रीमैच्योर बच्चों को संभालती हैं और घबराए माता-पिता को भरोसा देती हैं। उसके पीछे ट्रेनिंग के साथ-साथ एक निजी संघर्ष का अनुभव भी है।

नर्सिंग करियर के शुरुआती वर्षों में क्रिटिकल केयर यूनिट में काम करते समय उनकी पहली प्रेग्नेंसी जटिल हो गई और सिर्फ छह महीने तीन दिन में उन्होंने एक प्रीमैच्योर बेटे को जन्म दिया। वे याद करते हुए बताती हैं। “बच्चा पैदा होने के बाद रोया नहीं था। उसे तुरंत एनआईसीयू में भर्ती करना पड़ा।

लखनऊ के डालीगंज स्थित एक निजी अस्पताल के एनआईसीयू में उनका बेटा करीब डेढ़ महीने तक भर्ती रहा। उस दौरान गीता ने पहली बार एक मां की बेचैनी से एनआईसीयू को महसूस किया। हर सांस पर नजर, संक्रमण का डर और बच्चे के बचने की उम्मीद।

डॉक्टरों की निगरानी और गीता की देखभाल के बाद उनका बेटा स्वस्थ होकर घर लौटा। अगले छह महीनों तक उन्होंने घर में भी संक्रमण से बचाव और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखा।

गीता कहती हैं कि इस अनुभव ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी और उन्होंने नवजात देखभाल में काम करने का निर्णय लिया। वे मानती हैं कि व्यक्तिगत अनुभव के साथ एसएनसीयू में मिले प्रशिक्षण और लगातार काम के अनुभव ने उन्हें गंभीर नवजातों की देखभाल में दक्ष बनाया।

जब बेड नहीं था, फिर भी बच्चे को बचाया

गीता को आज भी एक ऐसा बच्चा याद है जिसे गंभीर हालत में अस्पताल लाया गया था। बच्चे को रुक-रुक कर सांस आ रही थी और परिवार इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं था। एसएनसीयू में बेड भी खाली नहीं था।

वे बताती हैं “मैंने डॉक्टर से कहा हमें कम से कम कोशिश तो करनी चाहिए। बच्चे को ऑक्सीजन, वार्मिंग और लगातार मॉनिटरिंग दी गई। बाद में उसे वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत पड़ी। करीब 20 दिन बाद वही बच्चा स्वस्थ होकर घर लौटा। आज भी उसकी फोटो मेरे पास है।

माँ-बाप का डर समझती हैं, क्योंकि वह खुद उससे गुजर चुकी हैं।

गीता सिर्फ बच्चों की देखभाल नहीं करतीं, बल्कि माता-पिता को भी संभालती हैं। वे कहती हैं, “मैं जानती हूं कि एसएनसीयू में बैठी माँ क्या महसूस करती है। इसलिए मैं उन्हें सिर्फ मेडिकल जानकारी नहीं देती, भरोसा भी देती हूं।

वे परिवारों को कंगारू मदर केयर, हाथों की स्वच्छता और नवजात देखभाल के बारे में लगातार समझाती हैं। कई बार खुद मां को बच्चे को सीने से लगाने के लिए प्रेरित करती हैं।

अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस पर गीता जैसी नर्स के कर्तव्यों की कहानी प्रेरणादायक हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button