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ज्ञान और कर्म एक दूसरे के पूरक – मुक्तिनाथानन्द 

रामकृष्ण मठ अध्यक्ष ने जगाई ज्ञान की ज्योति

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी स्थित रामकृष्ण मठ में भक्तों में ज्ञान का रसपान कराया गया।

बुधवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मानव जीवन में ज्ञान की प्राप्ति को अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है। परंतु एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि जब कोई व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

तब भी वह कर्म क्यों करता है? क्या उसे संसारिक कार्यों से विरक्त होकर केवल ध्यान और समाधि में ही लीन नहीं हो जाना चाहिए। इस विषय पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि ज्ञान और कर्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

स्वामी ने कहा कि ज्ञान प्राप्ति के बाद भी ज्ञानी व्यक्ति कर्म करता है, क्योंकि उसका मुख्य उद्देश्य ‘लोक शिक्षा’ और ‘दृष्टांत स्थापना’ होता है। वह अपने जीवन और आचरण के माध्यम से समाज को यह सिखाता है कि संसार में रहते हुए भी ईश्वर की प्राप्ति संभव है।

यदि ज्ञानी पुरुष कर्म करना छोड़ दें, तो सामान्य लोग उनके आचरण का अनुसरण नहीं कर पाएंगे और समाज में दिशाहीनता फैल सकती है। इसलिए ज्ञानी व्यक्ति अपने जीवन को एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करता है।

गीता में भी निष्काम कर्म का विशेष महत्व बताया गया है। ज्ञानी पुरुष किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या इच्छाओं की पूर्ति के लिए कर्म नहीं करते, बल्कि वे कर्म को ईश्वर अर्पण’ की भावना से करते हैं।

उनके लिए कर्म पूजा के समान होता है। वे कर्म के फल से आसक्त नहीं रहते, बल्कि केवल कर्तव्य समझकर कार्य करते हैं। इस प्रकार उनका कर्म ‘कर्मयोग’ बन जाता है, जो उन्हें और अधिक शुद्ध और उन्नत बनाता है।

स्वामी ने बताया कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व भी ज्ञानी व्यक्ति के कर्म करने का एक महत्वपूर्ण कारण है। यदि श्रेष्ठ व्यक्ति कर्म करना छोड़ दें, तो सामान्य लोग आलस्य और अज्ञान की ओर बढ़ सकते हैं। इससे समाज में अव्यवस्था और अकर्मण्यता का वातावरण बन सकता है।

इसलिए ज्ञानी पुरुष समाज का मार्गदर्शन करने के लिए कर्म करते रहते हैं। उनका जीवन एक प्रेरणा बनता है, जिससे लोग सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होते हैं। रामकृष्ण परमहंस का उदाहरण इस संदर्भ में अत्यंत प्रेरणादायक है।

उन्होंने अपने जीवन में अनेक शारीरिक कष्टों का सामना किया, फिर भी वे निरंतर लोगों को आध्यात्मिक मार्ग दिखाते रहे। उनके लिए कर्म का उद्देश्य स्वयं का लाभ नहीं, बल्कि दूसरों का कल्याण और सेवा था। उनका जीवन यह सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो दूसरों के हित में उपयोग किया जाए।

स्वामी ने कहा कि कर्म करने की शैली भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, कर्म में स्वार्थ का अभाव होना चाहिए। जब व्यक्ति अपने निजी लाभ के लिए कार्य करता है, तो उसमें अहंकार और आसक्ति उत्पन्न होती है। दूसरी बात, कर्म में निरंतरता होनी चाहिए।

बिना रुके और बिना थके अपने कर्तव्य का पालन करना ही सच्चा कर्मयोग है। तीसरी बात, कर्म ऐसा होना चाहिए जो दूसरों के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करे। जब व्यक्ति अपने आचरण से समाज को प्रेरित करता है, तभी उसका जीवन सार्थक होता है।

निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि ज्ञान प्राप्ति के बाद कर्म करना जीवन का परम उद्देश्य और एक प्रकार का आशीर्वाद है। ज्ञानी व्यक्ति कर्म को त्यागता नहीं, बल्कि उसे उच्चतर दृष्टिकोण से अपनाता है। वह स्वयं को ईश्वर का एक साधन मानकर कार्य करता है और अपने जीवन को समाज की सेवा में समर्पित कर देता है। इस प्रकार ज्ञान और कर्म का समन्वय ही सच्चे जीवन की पहचान है।

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