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टीबी मरीजों को पोषण सहयोग से उनके मनोबल में होती वृद्धि – प्रो सोनिया नित्यानंद 

25 टीबी से मरीजों को लिया गोद, बांटी पोषण पोटली

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत टीबी मरीजों को गोद लिया गया।

शुक्रवार को केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग द्वारा टीबी उन्मूलन की दिशा में निरंतर सराहनीय प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी केयर के तत्वाधान में हाईवे हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर

द्वारा “टीबी मुक्त भारत” अभियान के तहत 25 टीबी से पीड़ित बच्चों को गोद लिया गया और उन्हें पोषण पोटली प्रदान की गई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य टीबी मरीजों को बेहतर पोषण सहायता प्रदान करना एवं उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ में सहयोग करना है।

डा. सूर्यकान्त ने कार्यक्रम में उपस्थित चिकित्सकों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, सभी टीबी पीड़ित बच्चों एवं उनके परिजनों को संबोधित करते हुए कहा कि टीबी रोगियों के साथ किसी प्रकार का सामाजिक भेदभाव नहीं होना चाहिए।

उन्होंने बताया कि आज भी टीबी रोगियों, विशेषकर महिलाओं एवं बच्चों, को सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है, वहीं टीबी से पीड़ित बच्चों के साथ अन्य बच्चे न तो बैठते हैं और न ही खेलते हैं।

यह स्थिति मरीजों के हित में नहीं है, क्योंकि इससे उनके मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जबकि उन्हें इस समय परिवार और समाज के सहयोग व हौसले की सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

उन्होंने जोर देते हुए सभी टीबी रोगियों को बताया कि टीबी से पीड़ित प्रत्येक रोगी व उनके परिजनों को टीबी को छुपाना नहीं चाहिए, बल्कि बाहर निकलने पर रोगी एवं परिजनों को मास्क का उपयोग करना चाहिए।

जहां तक संभव हो, भीड़-भाड़ से दूर रहना चाहिए। मरीज और परिजनों के बीच बातचीत में भी सावधानी बरतनी चाहिए। क्योंकि एक टीबी रोगी खांसने या छींकने से कम से कम 15 नए टीबी रोगी संक्रमित कर सकता है।

उन्होंने बताया कि यदि दो सप्ताह से अधिक खांसी, खांसी में बलगम आना, खांसी में खून आना, सीने में दर्द, सांस लेने या खांसते समय दर्द महसूस होना, सांस फूलना, लंबे समय तक बुखार रहना, रात में अत्यधिक पसीना आना, थकान और कमजोरी महसूस होना, लगातार भूख की कमी रहना

तथा बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन कम होना जैसी समस्याएं दिखाई दें, तो शीघ्र ही नजदीकी टीबी केंद्र, जिला अस्पताल या सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

सबसे अहम बात यह है कि सभी टीबी मरीजों को अपना उपचार पूर्ण करना चाहिए और दवा बीच में नहीं छोड़नी चाहिए, अन्यथा गंभीर स्थिति उत्पन्न होकर एमडीआर टीबी होने का खतरा बढ़ जाता है। इससे मरीज की स्थिति अधिक बिगड़ सकती है और समय पर उपचार न मिलने पर जीवन के लिए खतरा भी बढ़ जाता है।

वहीं संस्थान कुलपति डा. सोनिया नित्यानन्द ने रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के प्रयासों की सराहना की और डा सूर्यकान्त को बधाई देते हुए कहा कि विभाग निक्षय मित्र योजना के अंतर्गत उत्कृष्ट कार्य कर रहा है तथा समाज के लिए एक प्रेरणास्रोत बनकर उभर रहा है।

उन्होंने कहा कि टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को प्राप्त करने में इस प्रकार की पहल अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे न केवल मरीजों को पोषण और सहयोग मिलता है, बल्कि उनके मनोबल में भी वृद्धि होती है।

सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर ड्रग रेजिस्टेंट टीबी केयर के संस्थापक प्रभारी डा सूर्यकान्त ने बताया कि अब तक 500 से अधिक टीबी रोग से ग्रसित मरीजों को गोद लिया जा चुका है।

इसके साथ ही वर्ष 2019 से एक गांव एवं एक स्लम एरिया को भी गोद लिया गया है। संस्थान द्वारा अब तक लगभग 15 ग्राम पंचायतों को गोद लिया जा चुका है।

डा सूर्यकान्त ने बताया कि निक्षय मित्र योजना के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों को टीबी मरीजों की सहायता के लिए आगे आने का अवसर मिलता है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के प्रयास टीबी के खिलाफ लड़ाई को मजबूत बनाते हैं और “टीबी मुक्त भारत” के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

यह पहल न केवल चिकित्सा सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदनाओं का भी प्रतीक है, जो समाज के अन्य संस्थानों और व्यक्तियों को भी इस मुहिम में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करती है।

रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग से डा अंकित कुमार, हाईवे हॉस्पिटल एंड ट्रॉमा सेंटर के प्रबंधक डॉ. मनोज कुमार सिंह, विवेक सिंह, अंजनेय सिंह, रजनी मिश्रा, सोनाली विश्वकर्मा विभाग से डाट्स की एनटीईपी टीम एसटीएस अमन भारती, टीबीएचवी बृजेंद्र सिंह,

टीबीएचवी ममता जोशी, एसटीएलएस जेपी तिवारी, एलटी संदीप मौर्य एवं मेडिकल ऑफिसर डॉ देवरत, जूनियर डाक्टर्स एवं समस्त स्वास्थ्य कर्मी उपस्थित रहे।

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