मनुष्य तर्क-वितर्क छोड़ करे,ईश्वरीय अनुभव -मुक्तिनाथानन्द
संसार में जितने मत,उतने ईश्वर के मार्ग

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। भक्तों की भक्ति के अनुसार ईश्वर मिलते हैं। बुधवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भगवान रामकृष्ण देव की शिक्षाएँ
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। उन्होंने सरल उदाहरणों और सहज भाषा के माध्यम से ईश्वर, धर्म और मानव जीवन के गहरे सत्य को समझाने का प्रयास किया। उनकी शिक्षाओं का मुख्य उद्देश्य यह था कि मनुष्य केवल तर्क-वितर्क में न उलझे, बल्कि ईश्वर को अनुभव करने का प्रयास करे।
स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण देव के अनुसार ईश्वर साकार भी हैं और निराकार भी। वे कहते थे कि भक्त जिस रूप में ईश्वर को मानता है, ईश्वर उसी रूप में उसकी श्रद्धा के अनुसार प्रकट होते हैं।
किसी के लिए भगवान कृष्ण प्रिय हो सकते हैं, किसी के लिए माँ काली, तो किसी के लिए निराकार ब्रह्म। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर किसी एक रूप तक सीमित नहीं हैं। वे अनंत हैं और सभी रूपों में विद्यमान हैं।
इस सत्य को समझाने के लिए उन्होंने “रंग वाले उदाहरण” का प्रयोग किया। उन्होंने बताया कि जैसे एक रंगरेज लोगों की पसंद के अनुसार कपड़ों को अलग-अलग रंगों में रंग देता है।
उसी प्रकार ईश्वर भी भक्तों की भावना और श्रद्धा के अनुसार अनेक रूप धारण करते हैं। यह उदाहरण हमें सिखाता है कि धर्म और उपासना के विभिन्न मार्ग वास्तव में एक ही परम सत्य तक पहुँचने के साधन हैं।
स्वामी ने कहा कि रामकृष्ण देव ने एक और प्रसिद्ध दृष्टांत सुनाया। जिसे जानवर वाला दृष्टांत” कहा जाता है। इसमें जंगल में एक विचित्र जानवर को देखकर अलग-अलग लोगों ने उसके अलग-अलग रंग बताए। कोई उसे लाल कहता था, कोई हरा और कोई पीला।
बाद में पेड़ के नीचे रहने वाले व्यक्ति ने समझाया कि वह जानवर समय-समय पर अपना रंग बदलता रहता है। इसलिए सभी अपने-अपने दृष्टिकोण से सही थे। इसी प्रकार ईश्वर भी अनेक रूपों और अनुभवों में प्रकट होते हैं।
मनुष्य अपनी सीमित दृष्टि के कारण केवल एक पक्ष को देख पाता है। उनकी शिक्षाओं का सबसे महत्वपूर्ण संदेश “अनुभूति” का महत्व है। वे कहते थे कि धर्म केवल पुस्तकों का ज्ञान या तर्क का विषय नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है।
जब तक मनुष्य स्वयं ईश्वर का अनुभव नहीं करता, तब तक उसका ज्ञान अधूरा रहता है। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि “धर्म अनुभूति का ही नाम है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि इस संसार में जितने मत हैं। उतने ही ईश्वर तक पहुँचने के मार्ग हैं। हमें दूसरों के धर्म, विचार और उपासना पद्धति का सम्मान करना चाहिए।
यदि मनुष्य प्रेम, श्रद्धा और सहिष्णुता को अपनाए, तो समाज में शांति और सद्भाव स्थापित हो सकता है। श्री रामकृष्ण देव की शिक्षाएँ आज भी मानवता को एकता, प्रेम और आध्यात्मिक जागरूकता का संदेश देती हैं।



