भगवान को पाने की तीब्र आकांक्षा बन जाती प्रेम – मुक्तिनाथानन्द
हमें अपनी शक्ति का करना चाहिए सदुपयोग

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी में शक्ति का सदुपयोग करने का मार्ग दिखालाया गया। शुक्रवार को
शुक्रवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने मानव जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण समस्या ‘काम’ वासना पर गहन आध्यात्मिक दृष्टि प्रस्तुत की है।
सामान्यतः लोग काम और क्रोध जैसे विकारों को नष्ट करने का प्रयास करते हैं, परन्तु इन्हें पूरी तरह समाप्त करना कठिन है। इसलिए इनका सबसे सरल और प्रभावी उपाय है उनकी दिशा बदल देना।
जब मनुष्य अपनी इच्छाओं और भावनाओं को केवल इंद्रिय सुख की ओर लगाता है, तब वे उसे बंधन में डालती हैं। लेकिन वही शक्ति यदि ईश्वर की ओर मोड़ दी जाए, तो वह भक्ति और प्रेम का रूप ले लेती है।
वैष्णव शास्त्रों के अनुसार अपनी इंद्रियों की संतुष्टि के लिए उत्पन्न तीव्र इच्छा ‘काम’ कहलाती है, जबकि वही तीव्र आकांक्षा जब भगवान को पाने के लिए होती है, तब वह ‘प्रेम’ बन जाती है।
इस प्रकार समस्या इच्छा में नहीं, बल्कि उसकी दिशा में है। यदि मनुष्य अपने मन की ऊर्जा को सांसारिक भोगों से हटाकर ईश्वर की प्राप्ति में लगाए, तो वही काम आध्यात्मिक उन्नति का साधन बन सकता है।
स्वामी विवेकानंद ने उल्लेख करते हुए कहा कि हमें अपनी शक्ति को नष्ट नहीं करना चाहिए। बल्कि उसका सदुपयोग करना चाहिए। जैसे बहती हुई नदी पर बांध बनाकर उससे बिजली उत्पन्न की जाती है।
उसी प्रकार मनुष्य की इच्छाशक्ति और काम-रूपी ऊर्जा को नियंत्रित कर उसे ईश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। जब यह शक्ति संयमित होकर उच्च लक्ष्य की ओर प्रवाहित होती है, तब जीवन में आत्मिक बल, शांति और स्थिरता आती है। इस संदर्भ में राजा ययाति की कथा भी अत्यंत शिक्षाप्रद है।
ययाति ने भोगों के माध्यम से अपनी इच्छाओं को शांत करने का प्रयास किया। परंतु जितना अधिक भोग किया, इच्छाएं उतनी ही बढ़ती गईं। यह कथा स्पष्ट करती है कि कामना भोग से कभी समाप्त नहीं होती।
वह अग्नि की तरह है। जिसमें जितना घी डाला जाए, वह उतनी ही अधिक प्रज्वलित होती है। इसलिए केवल बाहरी सुखों के पीछे भागने से मनुष्य को स्थायी संतोष प्राप्त नहीं हो सकता।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने यह संदेश दिया कि मनुष्य के भीतर उपस्थित सभी रिपुओं काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर को ईश्वर की दिशा में परिवर्तित किया जा सकता है।
यदि मनुष्य अपने जीवन का केंद्र भगवान को बना ले, तो वही शक्तियां जो उसे पतन की ओर ले जाती हैं, उसकी आध्यात्मिक उन्नति का कारण बन सकती हैं। यही सच्चा साधना मार्ग है, जो जीवन को शांत, संतुलित और ईश्वरमय बनाता है।



