ज्ञान दिशा देता, भक्ति गति – मुक्तिनाथानंद
ज्ञान और भक्ति दोनों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी में निरंतर आध्यात्मिक ज्ञान रूपी वर्षा की जा रही है।
शनिवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन में ज्ञान और भक्ति दोनों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।
सामान्यतः लोग इन्हें अलग-अलग मार्ग मानते हैं। फिर भी संत-महात्माओं के अनुसार ये एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। ज्ञान हमें सत्य का बोध कराता है, जबकि भक्ति उस सत्य को हृदय में अनुभव करने की शक्ति देती है। जब दोनों का संतुलन होता है, तभी मनुष्य का आध्यात्मिक जीवन पूर्ण बनता है।
स्वामी ने कहा कि केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। यदि व्यक्ति समाज के हित में उस ज्ञान का उपयोग करना चाहता है, तो उसके भीतर दो गुणों का होना आवश्यक है,पहला, ईश्वरीय सामर्थ्य और दूसरा, सेवा की सच्ची भावना।
बिना पात्रता और सही समय के आध्यात्मिक ज्ञान का प्रयोग कभी-कभी हानिकारक भी हो सकता है। इस संदर्भ में स्वामी विवेकानंद का उदाहरण दिया गया। जिन्होंने अपने ज्ञान और शक्ति का उपयोग मानव सेवा के लिए किया।
इससे यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा ज्ञान वही है जो दूसरों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करे। ज्ञान व्यक्ति को ईश्वर के बारे में जानकारी देता है और उसे बाहरी आंगन तक पहुँचा सकता है। जबकि भक्ति व्यक्ति को ईश्वर के “अंतःपुर” अर्थात हृदय तक पहुँचाती है।
ज्ञान बुद्धि का विषय है, जबकि भक्ति हृदय का विषय है। केवल तर्क और बुद्धि से ईश्वर की अनुभूति कठिन है; प्रेम, समर्पण और श्रद्धा के माध्यम से ही ईश्वर को सहज रूप से पाया जा सकता है।
स्वामी ने कहा कि एक उदाहरण द्वारा यह समझाया गया कि यदि कोई व्यक्ति गलत दिशा में भी चल रहा हो, लेकिन उसे सही मार्गदर्शन मिल जाए, तो वह अपने गंतव्य तक पहुँच सकता है।
उसी प्रकार, यदि किसी व्यक्ति के पास गहरा शास्त्रीय ज्ञान न भी हो, परंतु उसके हृदय में सच्ची भक्ति हो, तो वह ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। भक्ति मनुष्य को विनम्र बनाती है और उसे ईश्वर के निकट ले जाती है। हालाँकि, इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञान का कोई महत्व नहीं है।
ज्ञान हमें यह समझने में सहायता करता है कि संसार नश्वर है और ईश्वर ही एकमात्र सत्य हैं। जब यह समझ दृढ़ हो जाती है। तब मन स्वतः संसार से हटकर ईश्वर की ओर उन्मुख होने लगता है। यही परिपक्व ज्ञान आगे चलकर भक्ति में परिवर्तित हो जाता है।
इसलिए कहा गया है कि ज्ञान और भक्ति अंततः एक ही सत्य की ओर ले जाने वाले दो मार्ग हैं।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि ज्ञान और भक्ति का संबंध शरीर और आत्मा के समान है। ज्ञान दिशा देता है और भक्ति गति देती है। ज्ञान से विवेक उत्पन्न होता है और भक्ति से प्रेम।
जब दोनों का समन्वय होता है, तभी मनुष्य का जीवन सार्थक और सफल बनता है। यही आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक संदेश इंसान का मार्ग प्रशस्त करता है।



