यहाँ रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति कर रहा,दुःखों का सामना मुक्तिनाथानन्द
केवल ईश्वर ही शाश्वत सत्य

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आने वाले दुःखो का कारण बताया गया।
रविवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद नेकहा यह संसार स्वभावतः ‘दुःखालयम्’ है।
यहाँ रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी रूप में दुःखों का सामना करना ही पड़ता है। इसलिए दुखों से घबराने या उनसे भागने के बजाय उनके वास्तविक स्वरूप को समझकर ईश्वर की शरण में रहना ही जीवन का सही मार्ग है।
स्वामी ने शास्त्रों में वर्णित त्रिताप अर्थात् तीन प्रकार के दुःखों का वर्णन किया। पहला है आधिदैविक दुख, जो प्रकृति के कारण उत्पन्न होते हैं।
अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकंप, बाढ़, तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाएँ इसी श्रेणी में आती हैं। इन पर मनुष्य का कोई नियंत्रण नहीं होता। ऐसे समय में धैर्य, साहस और ईश्वर पर विश्वास ही हमारी सबसे बड़ी शक्ति बनते हैं।
दूसरा प्रकार है आधिभौतिक दुःख। ये दुःख अन्य प्राणियों, बाहरी परिस्थितियों अथवा समाज के व्यवहार से उत्पन्न होते हैं। किसी का कठोर व्यवहार, शत्रुता, आर्थिक कठिनाइयाँ या सामाजिक समस्याएँ हमें मानसिक और शारीरिक कष्ट देती हैं।
इन परिस्थितियों में क्रोध और निराशा के स्थान पर विवेक, क्षमा और सहनशीलता अपनाना आवश्यक है। तीसरा प्रकार है आध्यात्मिक दुःख जो हमारे अपने शरीर और मन से संबंधित होते हैं। रोग, शारीरिक पीड़ा, मानसिक तनाव, चिंता, भय और मोह इसी श्रेणी में आते हैं।
स्वामी ने कहा कि शरीर तो ‘व्याधि मंदिरम्’ है, अर्थात यह रोगों का घर है। इसलिए शरीर में कष्ट आना अस्वाभाविक नहीं है। यदि हम इस सत्य को स्वीकार कर लें तो दुःखों का प्रभाव हमारे मन पर कम हो जाता है।
स्वामी ने ने श्रीरामकृष्ण परमहंस के वचनों का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिकांश लोग बाहर से स्वयं को प्रसन्न दिखाते हैं, पर भीतर अनेक चिंताओं और दुःखों से जल रहे होते हैं।
संसार की वस्तुएँ और सुख क्षणिक हैं, इसलिए केवल बाहरी साधनों से स्थायी शांति प्राप्त नहीं हो सकती। सच्ची शांति भीतर से आती है, और उसका आधार ईश्वर का स्मरण तथा आत्मज्ञान है।
उन्होंने एक सुंदर उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे काँटे से हुए घाव का समाधान केवल काँटा निकालने से नहीं, बल्कि उसे जलाकर समाप्त करने से होता है, उसी प्रकार जीवन के दुःखों का स्थायी समाधान ‘ज्ञान की अग्नि’ में है।
जब मनुष्य ईश्वर के प्रति समर्पण, सत्य का अनुसरण और आत्मचिंतन करता है, तब उसके भीतर ऐसा ज्ञान उत्पन्न होता है जो दुःखों की तीव्रता को कम कर देता है। परिस्थितियाँ भले ही न बदलें, पर उन्हें देखने की हमारी दृष्टि बदल जाती है।
स्वामी ने यह भी स्पष्ट किया कि इस परिवर्तनशील संसार में केवल ईश्वर ही शाश्वत सत्य हैं। धन, पद, प्रतिष्ठा और संबंध समय के साथ बदल सकते हैं, किंतु ईश्वर का आश्रय कभी नहीं बदलता। इसलिए कठिनाइयों से भागने के बजाय उनका साहसपूर्वक सामना करना चाहिए और प्रार्थना, जप, ध्यान तथा सत्संग के माध्यम से ईश्वर की शरण ग्रहण करनी चाहिए।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि दुःख जीवन का अविभाज्य अंग हैं, परंतु वे हमें तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक रूप से परिपक्व बनाने के लिए आते हैं।
यदि हम त्रिताप की वास्तविकता को स्वीकार करें, ईश्वर पर अटूट विश्वास रखें और ज्ञान, भक्ति तथा समर्पण का मार्ग अपनाएँ, तो संसार के बीच रहते हुए भी मन की शांति और जीवन की सार्थकता प्राप्त कर सकते हैं।


