आध्यात्मिक शिक्षा देने से पहले,ईश्वर का अनुभव करना जरुरी – मुक्तिनाथानन्द
केवल पुस्तकीय ज्ञान या तर्क के आधार पर दूसरों का मार्गदर्शन करना उचित नहीं

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर दूसरों का मार्गदर्शन करना उचित नहीं।
बुधवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि आध्यात्मिक शिक्षा देने से पहले स्वयं ईश्वर का अनुभव करना आवश्यक है।
रामकृष्ण परमहंस के अनुसार केवल पुस्तकीय ज्ञान या तर्क के आधार पर दूसरों का मार्गदर्शन करना उचित नहीं है। सच्ची सेवा और शिक्षा ईश्वर की प्रेरणा से उत्पन्न होती है।
ईश्वर-साक्षात्कार के बाद व्यक्ति के भीतर अहंकार कम होकर विनम्रता और निःस्वार्थ भाव आता है। वह दूसरों को प्रसिद्धि या सम्मान पाने के लिए नहीं, बल्कि ईश्वर की सेवा समझकर मार्गदर्शन करता है।
इसलिए पहले स्वयं सत्य और ईश्वर को जानना चाहिए, फिर दूसरों की सहायता करनी चाहिए। यही वास्तविक आध्यात्मिक जीवन है। स्वामी ने बताया कि आध्यात्मिक शिक्षण का मुख्य संदेश विनम्रता, आत्मशुद्धि और ईश्वर की कृपा पर आधारित है।
मनुष्य को दूसरों की कमियाँ सुधारने या उन्हें उपदेश देने से पहले अपने भीतर झाँकना चाहिए। यदि हमारा अपना हृदय अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और दोषों से भरा हुआ है, तो दूसरों को सुधारने का प्रयास करना अहंकार का ही रूप बन सकता है।
इसलिए आध्यात्मिक जीवन की पहली आवश्यकता स्वयं को शुद्ध करना और ईश्वर की कृपा प्राप्त करना है।
स्वामी ने ऊँचे स्थान का उदाहरण भी दिया। कुछ लोग स्वयं को ऊँचे पर्वत के समान समझते हैं और मानते हैं कि उनके पास अधिक ज्ञान है।
जिसे वे दूसरों तक बाँट सकते हैं। लेकिन ऐसी भावना कई बार गर्व और श्रेष्ठता-बोध से उत्पन्न होती है। वास्तविक आध्यात्मिक ज्ञान व्यक्ति में अहंकार नहीं, बल्कि विनम्रता उत्पन्न करता है।
सच्चा मार्गदर्शन वही व्यक्ति दे सकता है जो स्वयं को ईश्वर का माध्यम या साधन मानता है। इसलिए मनुष्य को दूसरों को बदलने के बजाय पहले अपने विचारों, भावनाओं और आचरण को सुधारने पर ध्यान देना चाहिए।
जब भीतर शुद्धता और विनम्रता आती है, तभी हमारा जीवन दूसरों के लिए वास्तविक प्रेरणा बनता है।
स्वामी मंदिर का दृष्टांत बताते हुए एक लड़के की कहानी सुनाते हैं,जो एक उजड़े हुए मंदिर में घंटी बजा रहा था। जहाँ कोई मूर्ति स्थापित नहीं थी।
इसका अर्थ है कि अगर ईश्वर हमारे अपने हृदय में स्थापित नहीं है, तो बाहर से किया गया कोई भी धार्मिक कार्य, उपदेश या दिखावा खोखला और बेकार है। पहले हमें अपने अंदर भक्ति, सत्य और ईश्वर को स्थापित करना होगा।
जब अंदर मंदिर बन जाएगा, तभी बाहर की घंटी का भी महत्व होगा। बिना आंतरिक अनुभव के बाहरी कर्म निष्फल हैं।
स्वामी ने ईश्वरीय आदेश की आवश्यकता के बारे में स्वामी विवेकानंद और आदि शंकराचार्य का उदाहरण देते हैं। ये महान आध्यात्मिक गुरु केवल इसलिए उपदेश देने निकले क्योंकि उन्हें ईश्वर का प्रत्यक्ष आदेश मिला था।
बिना ईश्वरीय आदेश के उपदेश देना व्यर्थ है। ऐसा करने वाला व्यक्ति समाज में उपहास का पात्र भी बन सकता है। इसका अर्थ है कि सच्चा प्रचार अहंकार से नहीं, बल्कि ईश्वर की प्रेरणा और आदेश से होना चाहिए।
अर्थात पहले स्वयं को बदलो, ईश्वर को हृदय में बसाओ, और फिर यदि आदेश मिले तभी दूसरों को सिखाओ। स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि हमें ईश्वर-केंद्रित जीवन जीना चाहिए। सबसे पहले हमें विनम्र बनना चाहिए और ईश्वर के लिए तीव्र व्याकुलता, तड़प के साथ प्रार्थना करनी चाहिए।
जब हमारा हृदय पूरी तरह ईश्वर के लिए समर्पित हो जाता है, तब हम ईश्वर की कृपा के पात्र बन जाते हैं। उस अवस्था में यदि दूसरों की सेवा या उन्हें सिखाने की आवश्यकता होगी, तो ईश्वर स्वयं हमें रास्ता दिखाएंगे और मार्गदर्शन करेंगे।



