मानवता की सेवा में समर्पित होना ही सच्चा ज्ञानी- मुक्तिनाथानन्द
रामकृष्ण मठ अध्यक्ष ने कथा में जगाया आत्म ज्ञान

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। रामकृष्ण मठ में कथा प्रवचन में आत्म बोध कराया गया।
मंगलवार को अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने सतप्रसंग में कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ज्ञान और कर्म के संबंध पर गहन विचार किया गया है। केवल ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लेना ही अंतिम लक्ष्य नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को समाज के कल्याण में लगाना भी उतना ही आवश्यक है।
ठाकुर रामकृष्ण देव के अनुसार, महापुरुष ज्ञान प्राप्ति के बाद भी संसार में रहकर कर्म करते हैं। इसका उद्देश्य व्यक्तिगत मुक्ति से आगे बढ़कर लोकमंगल की भावना को साकार करना है। इतिहास में जनक, नारद और स्वामी विवेकानंद जैसे महान व्यक्तित्व इसके उदाहरण हैं।
इन महापुरुषों ने उच्चतम आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के बावजूद समाज से विमुख होने के बजाय, समाज के बीच रहकर लोगों को शिक्षा और मार्गदर्शन दिया। इससे यह सिद्ध होता है कि सच्चा ज्ञान व्यक्ति को निष्क्रिय नहीं बनाता, बल्कि उसे अधिक जागरूक और जिम्मेदार बनाता है।
स्वामी ने कहा कि लोक-शिक्षा का विचार भी इसी संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्ञानी पुरुष इसलिए कर्म करते हैं ताकि वे समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत कर सकें। जब समाज के श्रेष्ठ व्यक्ति निष्काम भाव से कार्य करते हैं, तो सामान्य लोग भी उनका अनुसरण करते हैं।
भगवद्गीता के तृतीय अध्याय में भी यही कहा गया है कि श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग उसी का अनुकरण करते हैं। इस प्रकार, महापुरुषों का जीवन स्वयं एक शिक्षाप्रद उदाहरण बन जाता है। किन्तु लोक-शिक्षक बनना कोई साधारण कार्य नहीं है।
इसके लिए केवल व्यक्तिगत इच्छा पर्याप्त नहीं होती, बल्कि ईश्वर का विशेष आदेश या ‘चापरास’ आवश्यक होता है। इसका अर्थ यह है कि समाज का मार्गदर्शन करने के लिए व्यक्ति को भीतर से दिव्य प्रेरणा और पात्रता प्राप्त होनी चाहिए। बिना इस आंतरिक अधिकार के, कोई भी व्यक्ति स्थायी रूप से लोक-शिक्षा का कार्य नहीं कर सकता।
मुक्तिनाथानन्द ने वैराग्य और कर्म के संबंध पर भी प्रकाश डाला। कहा ठाकुर के अनुसार, जब व्यक्ति सच्चे ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, तब उसका मन पूर्णतः शुद्ध हो जाता है। ऐसी स्थिति में किया गया कर्म उसे बंधन में नहीं डालता, क्योंकि वह कर्म स्वार्थ या आसक्ति से प्रेरित नहीं होता। वह केवल कर्तव्य और करुणा के भाव से किया जाता है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि इस प्रकार, ज्ञान, कर्म और लोक-शिक्षा का यह समन्वय हमें सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति का वास्तविक अर्थ केवल आत्मकल्याण नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाना भी है। सच्चा ज्ञानी वही है जो अपने ज्ञान को मानवता की सेवा में समर्पित करता है।



