दूसरों को आध्यात्मिक मार्ग दिखाने से पहले स्वयं सत्य का अनुभव करना जरुरी -मुक्तिनाथानन्द
ईश्वर की प्रत्यक्ष रूप से करें अनुभूति

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। दूसरों को आध्यात्मिक मार्ग दिखाने से पहले स्वयं सत्य का अनुभव करना जरुरी है।
शुक्रवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य केवल धर्मग्रंथों का अध्ययन करना, धार्मिक बातें सुनना या दूसरों को उपदेश देना नहीं है, बल्कि ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करना है।
जो व्यक्ति दूसरों को आध्यात्मिक मार्ग दिखाना चाहता है, उसके लिए पहले स्वयं उस सत्य का अनुभव करना आवश्यक है। केवल बौद्धिक ज्ञान के आधार पर किया गया उपदेश व्यक्ति के जीवन को वास्तविक दिशा नहीं दे सकता।
स्वामी ने कहा कि रामकृष्ण के अनुसार आध्यात्मिक सत्य केवल पुस्तकों में पढ़ लेने से प्राप्त नहीं होता। शास्त्र हमें मार्ग बताते हैं। मार्ग पर चलना और लक्ष्य तक पहुँचना स्वयं का अनुभव है।
इसे ज्ञान और विज्ञान के अंतर से समझा जा सकता है। किसी वस्तु के बारे में पढ़ना या उसके गुणों का वर्णन करना एक बात है, लेकिन उसे स्वयं अनुभव करना दूसरी बात है।
जैसे दूध के बारे में अनेक बातें जानने से शरीर को शक्ति नहीं मिलती; दूध पीने पर ही उसका वास्तविक लाभ मिलता है। उसी प्रकार ईश्वर के संबंध में पढ़ना और चर्चा करना आवश्यक हो सकता है, लेकिन आत्मिक परिवर्तन के लिए अनुभूति आवश्यक है।
स्वामी समझाया कि रामकृष्ण मानते थे कि केवल अपनी इच्छा से धार्मिक शिक्षक या आचार्य बन जाना पर्याप्त नहीं है। सच्चे आध्यात्मिक मार्गदर्शन के पीछे ईश्वर की प्रेरणा और अनुमति होनी चाहिए।
जिस व्यक्ति ने स्वयं सत्य का स्पर्श नहीं किया, उसका उपदेश केवल शब्दों का संग्रह बन सकता है। इसलिए आध्यात्मिक शिक्षा देने से पहले साधक को अपने जीवन में साधना, आत्मशुद्धि और ईश्वरानुभूति का प्रयास करना चाहिए।
एक सच्चे आचार्य की पहचान उसके शब्दों से अधिक उसके जीवन से होती है। उसके आचरण में वही सत्य दिखाई देना चाहिए जिसकी वह दूसरों को शिक्षा देता है। यदि कथनी और करनी में अंतर हो, तो उपदेश का प्रभाव समाप्त हो जाता है।
केवल प्रभावशाली भाषा, ज्ञान का प्रदर्शन या बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक बातें करना वास्तविक साधना का प्रमाण नहीं है। जैसे कोई व्यक्ति अस्तबल में घोड़ों की उपस्थिति का दावा करे, लेकिन वास्तव में वहाँ एक भी घोड़ा न हो, वैसे ही अनुभव के बिना किया गया आध्यात्मिक प्रचार केवल दिखावा बन सकता है।
स्वामी ने कहा आज के समय में यह संदेश और भी प्रासंगिक है। इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण हमें अनेक प्रकार के धार्मिक और आध्यात्मिक वक्ताओं के विचार आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
ऐसे वातावरण में विवेकपूर्वक यह पहचानना आवश्यक है कि कौन-सा मार्ग वास्तविक साधना और अनुभूति पर आधारित है। *इसलिए श्रीरामकृष्ण, स्वामी विवेकानंद और आदि शंकराचार्य जैसे महान अनुभवी आचार्यों की शिक्षाओं का अध्ययन करना अधिक उपयोगी है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि आध्यात्मिकता केवल बोलने या जानने का विषय नहीं बल्कि जीने और अनुभव करने का मार्ग है। पहले स्वयं सत्य की खोज करनी चाहिए, अपने जीवन को शुद्ध और अनुशासित बनाना चाहिए तथा ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति का प्रयास करना चाहिए।
जब जीवन स्वयं शिक्षा बन जाता है, तभी शब्दों में वास्तविक शक्ति आती है। यही सच्चे आचार्य की पहचान और आध्यात्मिक जीवन की सार्थकता है।
यह दृष्टि साधक को विनम्र भी बनाती है, क्योंकि वह दूसरों को बदलने से पहले स्वयं को बदलने का प्रयास करता है। ईश्वर की खोज बाहर की प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि अंतर्मन की शुद्धता, प्रेम, सेवा, सत्य और निरंतर साधना में होती है। ऐसी अनुभूति से निकला हुआ एक छोटा-सा शब्द भी अनेक लोगों के जीवन में प्रकाश ला सकता है।



