अक्षय तृतीया केवल एक पर्व नहीं- मुक्तिनाथानंद
सूर्य आत्मा, कर्म, अहंकार से मुक्ति और महत्वाकांक्षा का प्रतीक

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी स्थित राम कृष्ण मठ मंदिर में अक्षय तृतीया मनाई गयी।
सोमवार को इस अवसर पर स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने बताया कि पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन किए गए समस्त शुभ कार्यों का अक्षय (अविनाशी) फल प्राप्त होता है, इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है। साथ ही
उक्त समस्त कार्यक्रम का सीधा प्रसारण हमारे यूट्यूब चैनल ‘रामकृष्ण मठ लखनऊ’ के माध्यम से भी किया गया। जिसमें दूर-दराज के भक्तों ने इंटरनेट के माध्यम से घर बैठे सजीव प्रसारण देखा।
कार्यक्रम की शुरुआत मंगल आरती के पश्चात वैदिक मंत्रोच्चारण, पूजा-अर्चना एवं श्रीमद्भगवद्गीता पाठ के साथ हुई। जिसे मठ के स्वामी इष्टकृपानन्द ने संपन्न कराया । प्रातः काल के दौरान 7ः15 बजे स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज द्वारा ऑनलाइन धार्मिक सत्संग एवं प्रवचन सुनाया।
सायंकाल ठाकुर की संध्या आरती के पश्चात स्वामी इष्टकृपानन्द द्वारा भक्तिगीतों की प्रस्तुति तबले पर संगत शुभम राज के साथ की गयी।
तत्पश्चात मठ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने ‘‘युग सन्धि अक्षय तृतीया : कर्म और धर्म, भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि के बीच एक लौकिक सेतु’’ विषय पर विस्तृत प्रवचन देते हुए कहा कि अक्षय तृतीया, वैशाख शुक्ल तृतीया को मनाई जाने वाली एक अत्यंत पावन तिथि है।
यह केवल एक कैलेंडर की तिथि नहीं, बल्कि भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक विकास के बीच एक लौकिक सेतु है, जो कर्म और धर्म के संतुलन को दर्शाती है।
उन्होंने कहा कि ज्योतिषीय दृष्टि से इस दिन की विशेषता बताते हुए कहा कि हिंदू पंचांग का यह एकमात्र ऐसा दिन है जब सूर्य और चंद्रमा दोनों उच्च राशि में स्थित होते हैंकृसूर्य मेष राशि में तथा चंद्रमा वृषभ राशि में। यह दुर्लभ संयोग अधिकतम प्रकाश, संतुलन और चेतना का प्रतीक है।
सूर्य आत्मा, कर्म, अहंकार से मुक्ति और महत्वाकांक्षा का प्रतीक है, जबकि चंद्रमा मन, भावना, करुणा और शांति का प्रतीक है। जब ये दोनों संतुलन में होते हैं, तो आत्मा और मन का सामंजस्य स्थापित होता है तथा किया गया प्रत्येक कर्म एक पवित्र अर्पण बन जाता है। यह समय नए शुभ कार्यों के आरंभ के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
स्वामी ने कहा कि अनेक संत और आध्यात्मिक गुरु इस दिन को आध्यात्मिक बीज बोने का दिन मानते हैं। इस दिन लिए गए संकल्पकृजैसे नियमित जप, दान, सेवा या संयम-दीर्घकालीन आध्यात्मिक उन्नति का आधार बनते हैं।
‘अक्षय’ का अर्थ है जो कभी क्षय न हो। इस दिन किए गए जप, तप, दान, हवन एवं सत्कर्म का फल अनंत और स्थायी माना गया है।
पुराणों में वर्णित “मदनरत्न” नामक ग्रंथ के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को इस तिथि का महत्व बताते हुए कहा है
“अस्यां तिथौ क्षयमुपैति हुतं न दत्तं तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया।
उद्दिश्य दैवतपितॄन्क्रियते मनुष्यैः तच्चाक्षयं भवति भारत सर्वमेव ॥
अर्थात, इस तिथि पर किया गया दान और हवन कभी नष्ट नहीं होता, इसलिए इसे अक्षय तृतीया कहा गया है। देवताओं एवं पितरों के लिए किया गया कर्म अविनाशी फल प्रदान करता है।
उन्होंने आगे कहा कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह वह पावन दिन है जब सत्ययुग का समापन और त्रेतायुग का प्रारंभ हुआ, इसलिए इसे युगादि तिथि भी माना जाता है।
इस दिन भगवान परशुराम, नर-नारायण और हयग्रीव अवतार का प्राकट्य हुआ माना जाता है। इसी दिन गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। भगवान बद्रीनाथ जी के कपाट खुलते हैं तथा महाभारत काल में पांडवों को अक्षय पात्र की प्राप्ति एवं सुदामा-श्रीकृष्ण मिलन जैसी दिव्य घटनाएँ भी इसी तिथि से जुड़ी हुई हैं।
स्वामी ने कहा कि अक्षय तृतीया वास्तव में तप, त्याग, संस्कृति और आत्मशुद्धि की पावन सरिता है, जिसमें अवगाहन कर मनुष्य अपने जीवन को पवित्र बना सकता है। यह तिथि हमें सिखाती है कि केवल धर्मानुकूल कर्म ही शाश्वत फल प्रदान करते हैं।
कार्यक्रम के अंत में उपस्थित भक्तों को प्रसाद वितरण किया गया।


