प्रत्येक व्यक्ति के प्रवृत्ति, परिस्थिति व जिम्मेदारियाँ होती अलग- मुक्तिनाथानन्द
गृहस्थ जीवन में रहकर मन में कर सकते त्याग का अभ्यास

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। प्रत्येक व्यक्ति के प्रवृत्ति का मार्ग प्रशस्त किया गया।
बुधवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस के आध्यात्मिक संदेशों में मानव जीवन के लिए अत्यंत व्यावहारिक और सरल मार्गदर्शन मिलता है।
उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की प्रवृत्ति, परिस्थिति, जीवन की अवस्था और जिम्मेदारियाँ अलग-अलग होती हैं। इसलिए सभी लोगों के लिए आध्यात्मिक साधना का एक ही मार्ग उपयुक्त नहीं हो सकता।
किसी के लिए ईश्वर की साधना का मार्ग संन्यास हो सकता है, तो किसी के लिए परिवार और समाज के बीच रहते हुए मन को ईश्वर में लगाना। आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक उद्देश्य बाहरी परिस्थितियों को बदलना नहीं, बल्कि मन को शुद्ध करके उसे ईश्वर की ओर केंद्रित करना है।
स्वामी ने बताया कि युवाओं और ऐसे साधकों के लिए, जिन्होंने अभी संसार की जिम्मेदारियों में प्रवेश नहीं किया है, आध्यात्मिक जीवन के लिए यह समय विशेष अवसर प्रदान करता है।
जब मन पर सांसारिक आकर्षण और जिम्मेदारियों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है, तब व्यक्ति अपनी ऊर्जा को ईश्वर-चिंतन, प्रार्थना, ध्यान, जप, अध्ययन और सदाचार में लगा सकता है। इसलिए युवावस्था को आध्यात्मिक विकास के लिए एक स्वर्णिम अवसर माना जा सकता है।
इस समय विकसित किए गए अच्छे संस्कार आगे के जीवन में भी मार्गदर्शन करते हैं। दूसरी ओर, गृहस्थ व्यक्ति के सामने परिवार, नौकरी, समाज और अनेक प्रकार की जिम्मेदारियाँ होती हैं।
उसके लिए संसार को छोड़ देना आवश्यक नहीं है। रामकृष्ण का संदेश है कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी मन से त्याग का अभ्यास किया जा सकता है।
इसे मानसिक त्याग (मानसिक वैराग्य) कहा जा सकता है। इसका अर्थ जिम्मेदारियों से भागना नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों को निभाते हुए अत्यधिक आसक्ति से बचना है।
स्वामी ने कहा कि इसे नाव के सुंदर उदाहरण से समझाया जा सकता है। नाव पानी में रहेगी तभी अपनी यात्रा कर पाएगी, लेकिन यदि पानी नाव के भीतर भर जाए तो नाव डूब सकती है।
उसी प्रकार मनुष्य को संसार में रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए, लेकिन संसार की आसक्ति को अपने मन पर हावी नहीं होने देना चाहिए। परिवार की सेवा, नौकरी, पूजा-पाठ और सामाजिक दायित्वों को ईश्वर की सेवा मानकर किया जाए तो सामान्य जीवन भी साधना का रूप ले सकता है।
सेवा और कर्तव्य भी आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अंग हैं। परिवार की देखभाल, माता-पिता की सेवा, अपने कार्य को ईमानदारी से करना और समाज के प्रति अपने दायित्व निभाना इन सबको यदि निष्काम भाव और ईश्वर-स्मरण के साथ किया जाए, तो ये केवल सांसारिक कार्य नहीं रहते, बल्कि साधना बन जाते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति कार्य करते समय अपने भीतर ईश्वर की स्मृति बनाए रखे।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि श्रीरामकृष्ण के संदेश का सार यह है कि आध्यात्मिकता बाहरी रूप से संसार छोड़ने का नाम मात्र नहीं है; यह मन की दिशा बदलने का नाम है। मन संसार में रहते हुए भी ईश्वर में स्थिर रह सकता है।
हमें यह अहंकार भी छोड़ना चाहिए कि हमारे बिना संसार का काम नहीं चल सकता। जब व्यक्ति अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करता है और स्वयं को केवल एक साधन मानता है, तब अहंकार धीरे-धीरे कम होता है।
अंततः आध्यात्मिक सफलता का आधार व्यक्ति की बाहरी अवस्था नहीं, बल्कि उसके मन की शुद्धता, ईश्वर के प्रति प्रेम, आसक्ति से मुक्ति और निरंतर स्मरण है। युवा हो या गृहस्थ, प्रत्येक व्यक्ति अपनी परिस्थिति के अनुसार साधना कर सकता है।
संसार से भागना आवश्यक नहीं; आवश्यकता है संसार के बीच रहते हुए मन को संसार की आसक्ति से बचाने की। यही संतुलित जीवन मनुष्य को कर्तव्य, सेवा और ईश्वर-साधना के सुंदर समन्वय की ओर ले जाता है।



