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अहंकार त्यागने से खुलेगा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग – मुक्तिनाथानन्द

ईश्वर की शरणागति अहंकार से मुक्ति का मार्ग 

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर की शरण में जाने पर अहंकार से मुक्ति का मार्ग दिखाया । गुरुवार को

को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन का मूल उद्देश्य मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराना है।

इस मार्ग में सबसे बड़ी बाधा अहंकार है, जो व्यक्ति को ईश्वर से दूर ले जाता है और उसे स्वयं को ही सब कुछ मानने की भूल में डाल देता है।

रामकृष्ण वचनामृत में भगवान श्रीरामकृष्ण और डॉक्टर महेंद्रलाल सरकार के बीच हुआ एक प्रेरणादायक संवाद इस सत्य को अत्यंत सरलता से स्पष्ट करता है कि ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति ही अहंकार से मुक्ति का मार्ग है।

स्वामी ने चर्चा की शुरुआत भगवद्गीता के उस प्रसिद्ध सिद्धांत से की है जिसमें ज्ञान प्राप्ति के लिए तीन आवश्यक साधनों में प्रणिपात (विनम्रता), परिप्रश्न (जिज्ञासा) और सेवा का उल्लेख किया गया है।

श्रीरामकृष्ण समझाते हैं कि अहंकारी व्यक्ति के भीतर ज्ञान स्थिर नहीं हो सकता। जैसे ऊँची भूमि पर पानी नहीं ठहरता, वैसे ही अहंकार से भरे मन में ज्ञान का संचय नहीं होता।

सच्चा ज्ञान तभी प्राप्त होता है, जब व्यक्ति अपने अहं को त्यागकर विनम्र भाव से सत्य की खोज करता है। संवाद के दौरान डॉक्टर सरकार ने घोड़े का उदाहरण देकर कहा कि जीवन में सावधानी और आत्मसंयम आवश्यक हैं।

इस पर श्रीरामकृष्ण ने नारद और प्रह्लाद जैसे महापुरुषों का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि जो व्यक्ति पूर्ण रूप से ईश्वर को समर्पित हो जाता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। ऐसे महापुरुषों को अलग से सावधानी बरतने की आवश्यकता नहीं होती।

क्योंकि उनका जीवन ईश्वर की कृपा और मार्गदर्शन से संचालित होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सामान्य मनुष्य प्रयास करना छोड़ दे, बल्कि यह कि ईश्वर पर विश्वास और समर्पण उसके जीवन को सुरक्षित दिशा प्रदान करते हैं।

स्वामी ने कहा कि इसके बाद डॉक्टर सरकार ने प्रश्न किया कि यदि मनुष्य हर समय ईश्वर पर निर्भर रहेगा, तो उसका आत्मबल कैसे विकसित होगा। श्रीरामकृष्ण ने अत्यंत गहन उत्तर दिया कि सच्ची शरणागति कमजोरी नहीं, बल्कि सर्वोच्च शक्ति का स्रोत है।

जब व्यक्ति बालक की भाँति निष्कपट होकर स्वयं को ईश्वर के हाथों में सौंप देता है। तब उसकी व्यक्तिगत इच्छा ईश्वर की इच्छा में विलीन हो जाती है। उस अवस्था में जीवन का भार स्वयं भगवान संभालते हैं।

यह निर्भरता व्यक्ति को निर्बल नहीं बनाती, बल्कि उसे भय, चिंता और असुरक्षा से मुक्त कर देती है। श्रीरामकृष्ण के अनुसार आध्यात्मिक जीवन की वास्तविक नींव “मैं करता हूँ” की भावना का त्याग है।

जब तक मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है, तब तक वह बंधनों में जकड़ा रहता है। किंतु जब वह अपने समस्त कर्म और जीवन को ईश्वर के चरणों में अर्पित कर देता है, तब उसके भीतर से भय, संदेह और अशांति समाप्त होने लगते हैं। समर्पण के साथ ही मन में शांति, विश्वास और आनंद का उदय होता है।

स्वामी मुक्तिनाथानंद ने समझाया कि आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग अहंकार के पोषण में नहीं, बल्कि उसके त्याग में है। विनम्रता, श्रद्धा, सेवा और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।

जब मनुष्य बालक के समान सरल हृदय से ईश्वर का आश्रय ग्रहण करता है, तब वह न केवल ज्ञान प्राप्त करता है, बल्कि आंतरिक स्वतंत्रता, शांति और दिव्य आनंद का भी अनुभव करता है। यही श्रीरामकृष्ण के संदेश का सार है और यही आध्यात्मिक जीवन की सच्ची उपलब्धि है।

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