बिना संगठन कोई भी बड़ा कार्य संभव नहीं – स्वामी मुक्तिनाथानंद
रामकृष्ण मिशन का मना 129वाँ स्थापना दिवस

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। रामकृष्ण मिशन का 129वाँ स्थापना दिवस मनाया गया।
आधुनिक युग के महान संत स्वामी विवेकानन्द ने 01 मई 1897 को कोलकाता में बलराम बोस के निवास पर रामकृष्ण के संन्यासियों एवं गृहस्थ भक्तों की एक विशाल सभा आयोजित की।
इस अवसर पर उन्होंने संगठन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि “अनेक देशों का भ्रमण करने के बाद मैंने यह अनुभव किया है कि बिना संगठन के कोई भी बड़ा कार्य संभव नहीं हो सकता।
यह संघ श्री रामकृष्ण के नाम पर स्थापित होगा, हम सब प्रभु के सेवक हैं -आप सभी इस कार्य में सहयोग प्रदान करें।
इसी प्रेरणा से रामकृष्ण मिशन की स्थापना हुई और 129 वर्षों की गौरवपूर्ण यात्रा में यह एक विशाल वैश्विक परोपकारी संगठन के रूप में विकसित हो चुका है।
इसका मुख्यालय पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले में स्थित बेलूर मठ में है। रामकृष्ण मठ एवं रामकृष्ण मिशन के विश्वभर में कुल 295 शाखा केंद्र हैं, जिनमें से 226 भारत में तथा 69 केंद्र 24 अन्य देशों में स्थित हैं। इसके अतिरिक्त, 57 उप-केंद्र (27 भारत में एवं 30 विदेशों में) भी कार्यरत हैं।
रामकृष्ण मिशन का ध्येय वाक्य है-“आत्मनो मोक्षार्थं जगद्धिताय च” (अपने मोक्ष और विश्व के कल्याण के लिए)। मिशन को भारत सरकार द्वारा 1996 में डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार तथा 1998 में गांधी शांति पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।
शनिवार को रामकृष्ण मठ रामकृष्ण मंदिर प्रेक्षागृह में स्थापना दिवस आयोजित किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। जिसे स्वामी इष्टकृपानन्द ने किया।
रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम के प्रबंध समिति के सदस्य डॉ. सुलेमान अम्मार रिजवी ने उपस्थित संन्यासियों, भक्तों एवं अतिथियों का स्वागत किया। स्वामी रमाधीशानन्द ने मिशन के इतिहास एवं स्वामी विवेकानन्द के विचारों पर प्रकाश डाला।
उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड रामकृष्ण-विवेकानन्द भाव प्रचार परिषद के पूर्व संयोजक डॉ. हीरा सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम निरंतर गरीबों, वंचितों एवं समाज के विभिन्न वर्गों की सेवा कर रहा है तथा शिक्षा एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए विविध कार्यक्रम संचालित कर रहा है।
वहीं स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने कहा कि रामकृष्ण मिशन एक अद्वितीय एवं जीवंत संगठन है, जहाँ संन्यासी और गृहस्थ भक्त मिलकर आध्यात्मिक साधना तथा मानव सेवा के महान आदर्श को साकार करते हैं।
उन्होंने कहा कि यह मिशन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक व्यापक आध्यात्मिक आंदोलन है, जो “शिव ज्ञाने जीव सेवा” के सिद्धांत पर आधारित है।
उन्होंने आगे कहा कि आज के समय में, जब समाज अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब श्री रामकृष्ण, माँ शारदा और स्वामी विवेकानन्द के आदर्श अत्यंत प्रासंगिक हो उठते हैं। ये आदर्श हमें न केवल आध्यात्मिक दिशा देते हैं, बल्कि एक संतुलित, समरस और सेवा-प्रधान जीवन जीने की प्रेरणा भी प्रदान करते हैं।
*स्वामी जी ने विशेष रूप से कहा कि रामकृष्ण एक साथ आदर्श गृहस्थ और आदर्श संन्यासी थे, जिनका जीवन हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिकता केवल संन्यासियों तक सीमित नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग हो सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि संगठन की शक्ति ही किसी भी महान कार्य की सफलता का आधार होती है, और रामकृष्ण मिशन इसका सशक्त उदाहरण है। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे निःस्वार्थ सेवा, नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिकता को अपने जीवन में अपनाकर समाज के उत्थान में सक्रिय योगदान दें।
अपने उद्बोधन के अंत में स्वामी ने कहा कि रामकृष्ण संघ वास्तव में रामकृष्ण का ही विस्तृत स्वरूप है, और इससे जुड़कर प्रत्येक व्यक्ति न केवल अपनी आत्मिक उन्नति कर सकता है, बल्कि समाज के कल्याण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
धन्यवाद ज्ञापन सुखद राम पांडेय (सलाहकार, उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड रामकृष्ण-विवेकानन्द भाव प्रचार परिषद) द्वारा दिया गया।
कार्यक्रम का समापन स्वामी मुक्तिनाथानन्द द्वारा वैदिक संज्ञानसूक्त के मधुर गायन में उपस्थित श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे।



