उत्तर प्रदेशधर्म-अध्यात्मबड़ी खबर

आध्यात्मिक साधना केवल बाहरी धार्मिक आचरण करना नहीं- मुक्तिनाथानन्द 

ईश्वर के आकर्षण में मन बार-बार उसी दिव्य केंद्र की ओर लौटना चाहता 

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर के प्रति एकाग्रता के लाभ गिनाये गए।

शनिवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि आध्यात्मिक साधना का अंतिम उद्देश्य केवल बाहरी धार्मिक आचरण करना नहीं, बल्कि मन को उस अवस्था तक ले जाना है।

जहाँ साधक का चित्त ईश्वर में पूर्णतः एकाग्र और तल्लीन हो जाए। रामकृष्ण परमहंस के जीवन और शिक्षाओं में ऐसी ही गहन आध्यात्मिक अवस्था को ‘भाव’ कहा गया है।

भाव वह स्थिति है जिसमें मनुष्य की चेतना सामान्य मानसिक अवस्थाओं से ऊपर उठकर ईश्वर के चिंतन और अनुभव में डूब जाती है। यह केवल कल्पना या भावुकता नहीं, बल्कि साधना से उत्पन्न होने वाली गहरी आध्यात्मिक अनुभूति है।

स्वामी ने बताया कि सामान्यतः मनुष्य जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं का अनुभव करता है। किंतु भाव की अवस्था इन सामान्य अवस्थाओं से आगे की चेतना का संकेत देती है।

इस अवस्था में मन अत्यंत स्थिर, शांत और बाहरी विषयों से लगभग विरक्त हो जाता है। जिस प्रकार हवा रहित स्थान में दीपक की लौ बिना हिले स्थिर रहती है, उसी प्रकार साधक का मन भी सांसारिक विचारों और इच्छाओं के झंझावात से मुक्त होकर ईश्वर में स्थिर हो जाता है।

मन की यही स्थिरता आध्यात्मिक अनुभव की आधारभूमि बनती है। उन्होंने बताया कि इस संदर्भ में छोटे नारायण का उदाहरण अत्यंत प्रेरणादायक है।

उनकी गहन ध्यानावस्था ऐसी थी कि वे अपने आसपास के भौतिक वातावरण से लगभग अनभिज्ञ हो जाते थे। उनका ध्यान भीतर की ओर इतना केंद्रित हो जाता था कि बाहरी संसार का आकर्षण क्षीण पड़ जाता था।

यह उदाहरण बताता है कि जब मन को निरंतर ईश्वर की ओर लगाया जाता है, तब धीरे-धीरे उसकी बाहरी विषयों पर निर्भरता कम होने लगती है।

स्वामी ने समझाया कि ईश्वर से जुड़ने का सबसे बड़ा परिणाम आनंद है। संसार में मनुष्य अनेक प्रकार के सुखों की खोज करता है, लेकिन वे सुख सीमित और क्षणिक होते हैं।

इसके विपरीत ईश्वरानुभूति का आनंद साधक के भीतर गहरी शांति और संतोष उत्पन्न करता है। जब साधक को उस दिव्य आनंद का स्पर्श मिलता है, तब सांसारिक आकर्षण अपने आप फीके लगने लगते हैं।

ईश्वर का सौंदर्य और आकर्षण इतना गहरा अनुभव होता है कि मन बार-बार उसी दिव्य केंद्र की ओर लौटना चाहता है। लेकिन इस अवस्था की प्राप्ति के लिए मन को सांसारिक इच्छाओं और वासना से मुक्त करना आवश्यक है।

जब तक मन अनेक इच्छाओं, अपेक्षाओं और विषयों में बँटा रहता है, तब तक उसकी एकाग्रता कठिन होती है। इसलिए साधना में मन को ‘विषय-शून्य’ अथवा सांसारिक आकर्षणों से मुक्त करने पर विशेष बल दिया गया है।

इसका अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार के बीच रहते हुए मन की आसक्ति को धीरे-धीरे कम करना है।

स्वामी ने कहा कि ध्यान और आध्यात्मिक साधना का वास्तविक उद्देश्य इसी अंतर्मुखी यात्रा को मजबूत करना है। नियमित ध्यान, प्रार्थना, जप, सत्संग और ईश्वर-स्मरण के माध्यम से मन को शुद्ध और स्थिर किया जा सकता है।

जब मन की चंचलता कम होती है, तब भीतर छिपी आध्यात्मिक चेतना अधिक स्पष्ट होने लगती है। अतः ‘भाव’ केवल एक आध्यात्मिक अवस्था नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति गहरे प्रेम, एकाग्रता और आत्म-विस्मृति की अवस्था है।

स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण के जीवन से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि ईश्वर की प्राप्ति केवल बौद्धिक चर्चा का विषय नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव का मार्ग है।

मन को संसार की अनावश्यक इच्छाओं से मुक्त करके, उसे प्रेम और श्रद्धा के साथ ईश्वर में स्थिर करना ही इस यात्रा का सार है। जब मन दिव्य आनंद में स्थिर हो जाता है, तब जीवन का वास्तविक उद्देश्य और आंतरिक शांति दोनों प्राप्त होने लगते हैं।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button