रामकृष्ण परमहंस का उपदेश प्रत्येक साधक के लिए प्रेरणास्रोत – मुक्तिनाथानन्द
अनासक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। रामकृष्ण परमहंस का उपदेश प्रेरणादायक बताया गया। गुरुवार को
बृहस्पतिवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भगवान रामकृष्ण परमहंस का जीवन और उनके उपदेश आज भी प्रत्येक साधक के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि ईश्वर की प्राप्ति केवल संन्यासियों के लिए ही नहीं, बल्कि गृहस्थों के लिए भी संभव है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि मन संसार में रहते हुए भी ईश्वर की ओर उन्मुख रहे।
उनके उपदेश हमें यह सिखाते हैं कि बाहरी परिस्थितियों से अधिक महत्वपूर्ण हमारे मन की दिशा और उसकी शुद्धता है। रामकृष्ण के अनुसार संन्यासियों और गृहस्थों के लिए साधना के नियम अलग-अलग हैं।
संन्यासी के लिए संसार और विषय-वासनाओं का पूर्ण त्याग आवश्यक है। उसे कामिनी- कांचन अर्थात् भोग और धन के मोह से दूर रहना चाहिए। दूसरी ओर, गृहस्थ व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह परिवार और समाज का त्याग कर दे।
बल्कि उसे अपने सभी कर्तव्यों का पालन करते हुए मन में अनासक्ति का भाव विकसित करना चाहिए। यही गृहस्थ जीवन की वास्तविक साधना है।
अनासक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहकर भी उसके मोह में न फंसना है। रामकृष्ण कहते हैं कि मन स्वभाव से विषयों की ओर आकर्षित होता है, इसलिए उसे बार-बार ईश्वर के स्मरण में लगाना आवश्यक है।
नियमित प्रार्थना, नाम-जप, ध्यान और सत्संग के माध्यम से मन धीरे-धीरे ईश्वर की ओर स्थिर होने लगता है। जब मन ईश्वर में आनंद अनुभव करने लगता है, तब सांसारिक आकर्षण स्वतः कम होने लगते हैं।
स्वामी ने बताया कि इस सत्य को समझाने के लिए रामकृष्ण नाव का अत्यंत सुंदर उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि नाव का पानी में रहना स्वाभाविक है, लेकिन यदि पानी नाव के भीतर भर जाए तो वह डूब जाती है।
इसी प्रकार मनुष्य संसार में रहे, परिवार का पालन करे, अपने कर्तव्यों को निभाए, यह उचित है। यदि संसार का लोभ, अहंकार और आसक्ति मन के भीतर प्रवेश कर जाए, तो आध्यात्मिक जीवन बाधित हो जाता है।
इसलिए आवश्यक है कि हम संसार में रहें, लेकिन संसार को अपने भीतर स्थान न दें।
गृहस्थ जीवन के संबंध में भी रामकृष्ण ने व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया है। उनका मत था कि पति-पत्नी का संबंध केवल भौतिक सुख तक सीमित न रहकर आध्यात्मिक उन्नति का साधन भी बने।
परिवार में संयम, प्रेम, परस्पर सम्मान और ईश्वर-भक्ति का वातावरण हो। वे यह भी कहते हैं कि सीमित पारिवारिक उत्तरदायित्व मनुष्य को भजन, प्रार्थना और आत्मचिंतन के लिए अधिक समय प्रदान करते हैं।
इस प्रकार गृहस्थ जीवन भी ईश्वर-प्राप्ति का प्रभावी मार्ग बन सकता है। स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण का संदेश अत्यंत सरल और सार्वकालिक है। चाहे व्यक्ति संन्यासी हो या गृहस्थ, जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति और आत्मिक शांति होना चाहिए।
यदि मन में निरंतर ईश्वर का स्मरण, प्रार्थना और अनासक्ति का भाव बना रहे, तो संसार में रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन सफलतापूर्वक जिया जा सकता है।
उनके उपदेश आज के व्यस्त और भौतिकतावादी युग में भी उतने ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे हमें सिखाते हैं कि वास्तविक शांति बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि ईश्वर से जुड़े हुए निर्मल और संतुलित मन में निहित है।



