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आध्यात्मिक जीवन में सबसे बड़ी बाधा अहंकार- मुक्तिनाथानन्द 

ईश्वर के प्रति सच्चा समर्पण मनुष्य को सही दिशा प्रदान करता 

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर प्राप्ति के लिए अहंकार का त्याग बताया गया।

मंगलवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक अहंकार है ।

मनुष्य जब अपने ज्ञान, पद, धन, सामर्थ्य या उपलब्धियों को लेकर स्वयं को बड़ा समझने लगता है, तब उसके भीतर ईश्वर के प्रति समर्पण और विनम्रता के लिए स्थान कम होता जाता है।

रामकृष्ण परंपरा की शिक्षाओं में विनम्रता को ईश्वर-कृपा प्राप्त करने की अनिवार्य पात्रता माना गया है। जिस प्रकार जल स्वाभाविक रूप से ऊँचाई से नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार ईश्वर की कृपा और आध्यात्मिक ज्ञान भी विनम्र हृदय में सहज रूप से उतरते हैं।

स्वामी ने बताया कि अहंकार से भरा हुआ मन अपने ही विचारों और धारणाओं में इतना कठोर हो जाता है कि वह सत्य को ग्रहण नहीं कर पाता। एक ऊँचा और कठोर पर्वत वर्षा के जल को अपने भीतर रोक नहीं पाता, जबकि नीची भूमि जल को सहजता से ग्रहण कर लेती है।

इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने अहंकार को ऊँचा रखता है, वह आध्यात्मिक ज्ञान और कृपा को धारण करने में कठिनाई अनुभव करता है। इसलिए साधना की पहली आवश्यकता है। हृदय को सरल, नम्र और ग्रहणशील बनाना।

स्वामी ने बताया कि अहंकार के भी दो रूप समझे जा सकते हैं। पहला है अविद्या का अहंकार । यह वह अहंकार है जो मनुष्य को धन, प्रतिष्ठा, पद, शक्ति और सांसारिक उपलब्धियों से जोड़ देता है। व्यक्ति सोचता है,“मैं ही कर्ता हूँ, मेरे पास ही ज्ञान है और मेरी ही उपलब्धियाँ सबसे महत्वपूर्ण हैं।

ऐसा अहंकार मनुष्य को बाहरी संसार में अधिक उलझाता है और आत्मिक उन्नति में बाधा बनता है। दूसरा है विद्या का अहंकार। यह अपेक्षाकृत शुद्ध रूप है। जिसमें व्यक्ति अपने ज्ञान और सामर्थ्य का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करता है।

आदि शंकराचार्य जैसे महापुरुषों का जीवन हमें बताता है कि ज्ञान तभी सार्थक है जब वह अहंकार को बढ़ाने के बजाय ईश्वर की ओर ले जाए और मानवता की सेवा में लगाया जाए। यहाँ ‘मैं’ का भाव पूर्णतः समाप्त न भी हुआ हो, तो भी वह ईश्वर और समाज की सेवा का माध्यम बन जाता है।

स्वामी ने समझाया कि आध्यात्मिक साधक के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने भीतर की स्थिति को पहचाने। केवल दूसरों को उपदेश देना, अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना या स्वयं को आध्यात्मिक समझना पर्याप्त नहीं है।

वास्तविक साधना तो भीतर की प्रार्थना, आत्मनिरीक्षण और समर्पण से प्रारंभ होती है। जब मनुष्य सच्चे हृदय से ईश्वर को पाने की आकांक्षा करता है और अपनी सीमाओं को स्वीकार करता है, तब उसकी दृष्टि धीरे-धीरे भीतर की ओर मुड़ती है।

ईश्वर के प्रति सच्चा समर्पण मनुष्य को सही दिशा प्रदान करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति अपने कर्तव्यों से भाग जाए, बल्कि यह है कि वह अपने कार्यों को अहंकार और व्यक्तिगत प्रदर्शन का साधन न बनाए।

सेवा तभी अधिक पवित्र बनती है जब उसके पीछे प्रसिद्धि, प्रशंसा या स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की इच्छा न हो। जब सेवा ईश्वर की प्रेरणा और आदेश की भावना से की जाती है, तब वही कर्म साधना बन जाता है।

स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि ईश्वर-साक्षात्कार के मार्ग में सबसे बड़ी आवश्यकता है। अहंकार का त्याग, विनम्रता का विकास और पूर्ण समर्पण। हमें अपने ज्ञान और सामर्थ्य पर गर्व करने के बजाय उन्हें ईश्वर की देन मानना चाहिए।

सरल और ग्रहणशील हृदय ही दिव्य कृपा को धारण कर सकता है। सच्ची आध्यात्मिकता तब प्रकट होती है, जब ‘मैं करता हूँ’ का भाव धीरे-धीरे बदलकर ‘ईश्वर मुझसे करा रहे हैं’ में परिवर्तित हो जाता है। यही परिवर्तन मनुष्य को अहंकार से उठाकर विनम्रता, सेवा और अंततः ईश्वर-साक्षात्कार की दिशा में ले जाता है।

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