मनुष्य के भीतर विद्यमान चेतना का अनुभव केवल बाहरी ज्ञान से नहीं- मुक्तिनाथानन्द
विज्ञान प्रश्न पूछना सिखाता और आध्यात्मिकता भीतर की यात्रा

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। मनुष्य के भीतर विद्यमान चेतना के बारे में बताया गया। सोमवार को
सोमवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मानव जीवन में विज्ञान और आध्यात्मिकता दोनों का विशेष महत्व है।
विज्ञान बाहरी जगत, शरीर और प्रकृति के नियमों को समझने का प्रयास करता है। जबकि आध्यात्मिकता मन, चेतना और परम सत्य की खोज की ओर ले जाती है।
रामकृष्ण परमहंस के जीवन और शिक्षाओं के संदर्भ में इन दोनों दृष्टियों का समन्वय एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बन जाता है। उनके आध्यात्मिक अनुभव यह संकेत देते हैं कि मनुष्य के भीतर ऐसी चेतना विद्यमान है।
जिसका अनुभव केवल बाहरी ज्ञान से नहीं, बल्कि आत्मानुभूति से भी किया जा सकता है। स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण के जीवन में आने वाले भावावस्था और समाधि जैसे अनुभवों को उनके समय के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. महेंद्रलाल सरकार ने वैज्ञानिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया था।
चिकित्सा-विज्ञान की दृष्टि से ऐसी अवस्थाओं में तंत्रिका-तंत्र की गतिविधियों में परिवर्तन होने से व्यक्ति के सामान्य शारीरिक नियंत्रण और व्यवहार में बदलाव दिखाई दे सकता है।
इस दृष्टिकोण से आध्यात्मिक अनुभवों के पीछे शरीर और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को समझने का प्रयास किया जाता है। विज्ञान का यह दृष्टिकोण अनुभव की शारीरिक प्रक्रिया पर प्रकाश डालता है। इसके विपरीत, तांत्रिक और आध्यात्मिक परंपरा इन अनुभवों को चेतना के उच्च स्तर से जोड़ती है।
महिमा चरण चक्रवर्ती द्वारा प्रस्तुत आध्यात्मिक दृष्टिकोण में सुषुम्ना नाड़ी का विशेष महत्व बताया गया है। योग और तंत्र परंपरा के अनुसार शरीर में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन मिलता है।
सुषुम्ना को मेरुदंड के मध्य स्थित सूक्ष्म ऊर्जा-मार्ग के रूप में समझाया जाता है। आध्यात्मिक परंपरा में कुंडलिनी शक्ति के सुषुम्ना मार्ग से ऊपर उठने को चेतना के जागरण और आध्यात्मिक अनुभूति से जोड़ा गया है।
स्वामी ने समझाया इसी संदर्भ में मन के तीन गुणों में सत्त्व, रजस् और तमस् का भी उल्लेख महत्वपूर्ण है। सत्त्व शुद्धता, ज्ञान और संतुलन का प्रतीक है; रजस् सक्रियता, इच्छा और कर्म से जुड़ा है; जबकि तमस् जड़ता, आलस्य और अज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है।
इन तीनों गुणों को त्रिगुणात्मक प्रकृति का आधार माना गया है। आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य मन को अधिक संतुलित और निर्मल बनाना है, ताकि साधक अपने भीतर की चेतना को अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव कर सके।
जब सुषुम्ना के सक्रिय होने को संतुलन और उच्च चेतना की अवस्था से जोड़ा जाता है, तब यह विचार सामने आता है कि मनुष्य के भीतर बाहरी संसार से परे एक सूक्ष्म आध्यात्मिक आयाम भी हो सकता है।
यहाँ विज्ञान और आध्यात्मिकता की भाषा अलग-अलग है, लेकिन दोनों मानव अनुभव को समझने का प्रयास करते हैं। विज्ञान तंत्रिका-तंत्र और शरीर की संरचना पर ध्यान देता है, जबकि आध्यात्मिक परंपरा चेतना, साधना और आत्मानुभूति पर।
स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण का संदेश इस पूरी चर्चा को एक गहरे स्तर पर ले जाता है। उनके अनुसार ईश्वर को केवल पुस्तकीय ज्ञान या दूसरों के अनुभव के आधार पर स्वीकार करना पर्याप्त नहीं है।
मनुष्य को स्वयं सत्य की खोज करनी चाहिए और आध्यात्मिक साधना के माध्यम से उसका अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार विज्ञान हमें अनुभव की बाहरी और जैविक प्रक्रिया को समझने में सहायता देता है, जबकि आध्यात्मिकता उसके आंतरिक अर्थ की खोज कराती है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि विज्ञान और आध्यात्मिकता को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय मानव जीवन को समझने के दो अलग-अलग दृष्टिकोणों के रूप में देखा जा सकता है।
रामकृष्ण का जीवन हमें आत्मानुभूति, सत्य की खोज और चेतना के विकास की प्रेरणा देता है। विज्ञान प्रश्न पूछना सिखाता है और आध्यात्मिकता भीतर की यात्रा करना। इन दोनों के संतुलित संवाद से मनुष्य अपने अस्तित्व को अधिक व्यापक और गहरे रूप में समझ सकता है।



