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वैज्ञानिकों ने माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण से उभरते पर्यावरणीय खतरों पर की चर्चा

राजधानी में देश विदेश के वैज्ञानिकों का पर्यावरण बचाने पर विचार विमर्श

 

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण बचाव पर आधारित वैज्ञानिक सत्र चलाया जा रहा है।

सोमवार को राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान में देश-विदेश से आए वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने व्यापक वैज्ञानिक संवाद किया। सातवें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन की शुरुआत पोस्टर सत्र से हुई।

जिसमें जैव विविधता संरक्षण, जैव-अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास लक्ष्य, खाद्य एवं पोषण सुरक्षा में एथ्नोबॉटनी, तथा बदलती जलवायु में पुष्पकृषि जैसे विविध विषयों पर महत्वपूर्ण शोध प्रस्तुत किए गए।

इसके उपरांत हुए प्लेनरी सत्र में प्रमुख वैज्ञानिक वक्ताओं में डॉ. जेसन सी. व्हाइट, निदेशक, कनेक्टिकट एग्रीकल्चरल एक्सपेरिमेंट स्टेशन, यूएसए, जिन्होंने सत्र में ऑनलाइन जुड़कर नैनोजैवप्रौद्योगिकी आधारित रणनीतियों द्वारा फसल तनाव-सहनशीलता पर प्रकाश डाला।

डॉ. अजित के.शासनी, निदेशक एनबीआरआई ने पौधों की आंतरिक प्रतिरक्षा का उपयोग कर जलवायु परिवर्तन के चलते बढ़ते तनाव के प्रति सहनशीलता बढ़ाने की संभावनाओं पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया।

प्रो. ऋषिकेश भालेराव, स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (SLU), स्वीडन, ने सत्र में ऑनलाइन जुड़कर जलवायु परिवर्तन के प्रति पादप-परितंत्र की प्रतिक्रिया व अनुकूलन रणनीतियों पर महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किया।

दिन भर में आयोजित तकनीकी सत्रों में जैव-विविधता एवं पुराविज्ञान, जैव-अर्थव्यवस्था एवं सतत विकास लक्ष्यों, प्रकृति-आधारित तकनीकें, पर्यावरणीय सूक्ष्मजीवविज्ञान तथा माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण जैसे उभरते पर्यावरणीय खतरों पर चर्चा की गई, जिससे बहु-विषयक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का समृद्ध आदान-प्रदान हुआ।

उत्तर प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड द्वारा प्रायोजित विशेष सत्र में प्रो. पुनीत के. द्विवेदी, क्लेम्सन यूनिवर्सिटी, यूएसए, जिन्होंने लकड़ी के अपशिष्ट से टिकाऊ विमानन ईंधन उत्पादन पर आपूर्ति-श्रृंखला आधारित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

डा. बी. प्रभाकर, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (मॉनिटरिंग एवं वर्किंग प्लान), उत्तर प्रदेश एवं सचिव, उत्तर प्रदेश राज्य जैव विविधता बोर्ड, ने जैव विविधता संरक्षण में ग्राम पंचायतों की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।

डॉ. अयनदार अरुणाचलम, निदेशक, केंद्रीय कृषि-वनीकरण अनुसंधान संस्थान, भारत, ने खाद्य सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए कृषि-वनीकरण आधारित समाधानों पर वक्तव्य दिया।

प्रो. महेश जी. ठक्कर, निदेशक, बीरबल साहनी पुराजीव विज्ञान संस्थान (BSIP), ने पृथ्वी के ऐतिहासिक पर्यावरणीय साक्ष्यों को भविष्य की पर्यावरणीय चुनौतियों से जोड़ा।

दूसरे दिन कुल 10 प्लेनरी व्याख्यान, 11 आमंत्रित व्याख्यान और 24 मौखिक प्रस्तुतियाँ संपन्न हुईं। जिनमें यूएसए की लिंकन यूनिवर्सिटी, भारत के आईआईटी खड़गपुर, बांग्लादेश के शेर-ए-बांगला एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, भारत के बनारस हिंदू विश्वविद्यालय सहित अनेक संस्थानों के वैज्ञानिक शामिल रहे।

विचार-विमर्श में पारिस्थितिकी-सहनशीलता, जलवायु-अनुकूल फसल विकास, मृदा-शोधन, संसाधन-कुशल कृषि, तथा सामुदायिक-आधारित संरक्षण प्रथाओं पर उल्लेखनीय प्रगति प्रदर्शित हुई। जिससे ICPEP-7 एक वैश्विक पर्यावरण-विज्ञान एवं पादप-आधारित अनुसंधान मंच के रूप में मजबूती मानी जा रही है।

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