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ईश्वर का वास्तविक अनुभव भक्ति- मुक्तिनाथानन्द

ईश्वर प्राप्त करने को साधना, चिंतन और आत्मसमर्पण होना जरुरी 

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर का वास्तविक अनुभव भक्ति से होती है ।

शुक्रवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भारतीय अध्यात्म में ईश्वर के दो स्वरूप बताए गए हैं।

साकार और निराकार, साकार अर्थात वह रूप जिसे देखा, पूजा और अनुभव किया जा सके। जबकि निराकार वह अनंत सत्ता है जो किसी रूप, रंग या सीमा में बंधी नहीं है। अनेक लोग इन दोनों रूपों को अलग-अलग मानते हैं।

रामकृष्ण परमहंस ने अपने विचारों के माध्यम से समझाया कि वास्तव में दोनों एक ही परम सत्य के दो रूप हैं।

स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण परमहंस के अनुसार ईश्वर को केवल तर्क और बुद्धि से समझा नहीं जा सकता। ईश्वर का वास्तविक अनुभव भक्ति, साधना, चिंतन और आत्मसमर्पण से होता है।

जब मनुष्य सच्चे हृदय से भगवान का स्मरण करता है। तब वह ईश्वर के निकट पहुँचता है। केवल शास्त्र पढ़ लेने या वाद-विवाद करने से ईश्वर की प्राप्ति संभव नहीं होती, बल्कि उसके लिए आंतरिक शुद्धता और प्रेम आवश्यक है।

ठाकुर ने साकार और निराकार के संबंध को समझाने के लिए जल और बर्फ का सुंदर उदाहरण दिया। जैसे पानी स्वयं निराकार होता है। ठंड के प्रभाव से वही पानी बर्फ बनकर आकार धारण कर लेता है, वैसे ही निराकार ब्रह्म भक्तों की भक्ति और प्रेम के कारण साकार रूप में प्रकट हो जाता है।

इसका अर्थ यह है कि भगवान अपनी कृपा से भक्तों के लिए अलग-अलग रूप धारण करते हैं ताकि भक्त उन्हें आसानी से प्रेम और श्रद्धा के साथ अनुभव कर सकें।

स्वामी ने समझाया कि भगवान श्रीरामकृष्ण यह भी बताते हैं कि साकार और निराकार में कोई मूलभूत अंतर नहीं है। यह केवल साधक की अवस्था और दृष्टिकोण का अंतर है। जब साधक भक्ति के मार्ग पर चलता है, तब वह ईश्वर को किसी रूप में अनुभव करता है।

जब ज्ञान का उदय होता है, तब वही साधक समझता है कि समस्त जगत में एक ही परमात्मा व्याप्त है। उन्होंने बताया कि उस अवस्था में साकार रूप भी अंततः निराकार में विलीन हो जाता है। भक्ति और ज्ञान दोनों ही ईश्वर प्राप्ति के महत्वपूर्ण मार्ग हैं।

किसी व्यक्ति की रुचि यदि मूर्ति पूजा, आरती और भजन में है, तो वह साकार रूप से भगवान की उपासना कर सकता है। वहीं जो व्यक्ति ध्यान और आत्मचिंतन के माध्यम से ईश्वर को समझना चाहता है, वह निराकार ब्रह्म की साधना कर सकता है। दोनों मार्ग अंततः एक ही सत्य की ओर ले जाते हैं।

स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भगवान रामकृष्ण परमहंसदेव का संदेश हमें धार्मिक सहिष्णुता, प्रेम और आध्यात्मिक एकता की शिक्षा देता है। वे बताते हैं कि ईश्वर को पाने का सबसे बड़ा साधन सच्ची श्रद्धा, प्रेम और निरंतर अभ्यास है। मनुष्य यदि अहंकार छोड़कर ईश्वर की ओर बढ़े, तो वह अवश्य ही परम सत्य का अनुभव कर सकता है।

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