भक्तों को ईश्वर के अनेक रूपों में होते दर्शन- मुक्तिनाथानंद
ईश्वर को पाने को लड़ना नहीं, प्रेम करना सीखो

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। भक्तों को ईश्वर के अनेक रूपों में दर्शन होते हैं। मंगलवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि ईश्वर अनंत और असीम हैं।
उन्हें किसी परिभाषा, आकार या सीमा में बाँधा नहीं जा सकता। वे देश-काल से परे, निराकार ब्रह्म हैं। वही ब्रह्म भक्तों की पुकार पर सगुण-साकार रूप भी धारण करता है। जैसे जल का कोई आकार नहीं, पर बर्फ बनकर वह आकार ले लेता है,
वैसे ही निराकार ईश्वर भक्तों के प्रेम को पूर्ण करने के लिए राम, कृष्ण, शिव, काली के रूप में प्रकट होते हैं। इसलिए ज्ञानी के लिए ईश्वर का निराकार रूप माधुर्यपूर्ण है, तो भक्त के लिए उनका सगुण रूप।
दोनों में विरोध नहीं, पूर्णता है। श्रीरामकृष्ण कहते थे। “चाहे छत पर सीढ़ी से चढ़ो या बाँस से, पहुँचोगे छत पर ही।” ईश्वर तक पहुँचने के लिए निराकार और साकार, दोनों ही मार्ग मान्य हैं।
स्वामी ने ठाकुर श्रीरामकृष्ण की वाणी दोहराते हुए कहा “ईश्वर एक ही हैं, पर भक्त अपनी रुचि के अनुसार उन्हें अलग-अलग रूपों में देखते हैं। कोई उन्हें विष्णु कहकर पूजता है, कोई शिव, कोई अल्लाह, कोई जीसस। यहाँ महत्वपूर्ण बात है ‘इष्ट निष्ठा’।
अपने इष्ट के प्रति अटूट प्रेम और निष्ठा रखना भक्ति का सार है। पर इसका अर्थ दूसरे के इष्ट का विरोध करना नहीं है। अपनी पत्नी से प्रेम करने का मतलब यह नहीं
कि हम संसार की सभी स्त्रियों से घृणा करें। वैसे ही अपने इष्ट को मानना संकीर्णता नहीं, पर दूसरे के मार्ग को हीन समझना संकीर्णता है। सभी नदियाँ घूम-फिरकर समुद्र में ही मिलती हैं।
ईश्वर के अनेक रूपों को समझाने के लिए स्वामी जी ने एक सुंदर दृष्टांत दिया। एक रंगरेज के पास केवल एक ही रंग का गमला था। कोई ग्राहक लाल रंग का कपड़ा माँगता, तो वह उसी गमले में डुबोकर लाल कपड़ा निकाल देता।
कोई पीला माँगता तो पीला, कोई आसमानी माँगता तो आसमानी। ग्राहक चकित थे कि एक ही गमले से अलग-अलग रंग कैसे निकलते हैं। रंगरेज ने कहा “रंग तो एक ही है, पर तुम्हारी श्रद्धा और माँग के अनुसार वह बदल जाता है।
ठीक वैसे ही, परमात्मा एक ही हैं। भक्त उन्हें जिस भाव से भजता है, वे उसी रूप में प्रकट हो जाते हैं। वैष्णव को वे कृष्ण रूप में, शैव को शिव रूप में, शाक्त को काली रूप में मिलते हैं। रंग गमले का नहीं, भक्त की श्रद्धा का है।
प्रवचन के अंत में स्वामी ने कहा सभी उपासनाएँ, सभी रास्ते उसी एक परमात्मा तक ले जाती हैं। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च ये सब उसी की ओर जाने वाले द्वार हैं।
सच्चा आध्यात्मिक समन्वय यही है कि हम किसी के प्रति विरोध का भाव न रखें। सबकी रुचि का सम्मान करें। श्रीरामकृष्ण का जीवन स्वयं इसका प्रमाण था। उन्होंने इस्लाम, ईसाई और वैष्णव, शाक्त, वेदांत—सभी मार्गों की साधना करके दिखाया कि “यत मत, तत पथ”जितने मत, उतने पथ। पर लक्ष्य सबका एक ही है।
निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने बताया कि आज जब धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी की जा रही हैं, ईश्वर को पाने के लिए लड़ना नहीं, प्रेम करना सीखो। अपने इष्ट से प्रेम करो, पर दूसरे के इष्ट का भी आदर करो।
क्योंकि रंगरेज का गमला एक ही है, रंग हमारी माँग के हैं। जब यह बोध हो जाएगा, तब मंदिर-मस्जिद के झगड़े स्वतः समाप्त हो जाएँगे और वसुधैव कुटुंबकम् का स्वप्न साकार होगा।



