उत्तर प्रदेशधर्म-अध्यात्मबड़ी खबर

मानव जीवन में आध्यात्मिक मार्गदर्शन जरुरी – मुक्तिनाथानन्द 

रामकृष्ण मठ अध्यक्ष ने कराया आत्मबोध 

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। मानव जीवन में ज्ञान, सेवा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। केवल इच्छा या उत्साह ही किसी व्यक्ति को सच्चा मार्गदर्शक नहीं बना सकता।

यह बातें शुक्रवार को निराला नगर स्थित रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने प्रातः कालीन सत् प्रसंग में कही। उन्होंने कहा कि इसके लिए आंतरिक शक्ति, पात्रता और ईश्वर की कृपा आवश्यक होती है। दूसरों का मार्गदर्शन करने से पहले व्यक्ति को स्वयं साधना और आत्मविकास के माध्यम से योग्य बनना चाहिए।

रामकृष्ण देव एक अत्यंत सरल उदाहरण द्वारा इस सत्य को समझाते हैं। वे कहते हैं कि यदि एक सड़ी हुई लकड़ी स्वयं अपना भार नहीं संभाल सकती, तो उस पर यदि एक छोटा पक्षी भी बैठ जाए तो वह डूब जाएगी।

इसी प्रकार जो व्यक्ति स्वयं आध्यात्मिक रूप से मजबूत नहीं है, वह दूसरों को सही दिशा नहीं दे सकता। आज के समय में बहुत से लोग बिना आत्म अनुभव और साधना के दूसरों को शिक्षा देने लगते हैं। जिससे भ्रम और असंतुलन पैदा होता है। इसलिए पहले स्वयं को मजबूत बनाना आवश्यक है।

स्वामी ने बताया कि “ईश्वरीय आदेश” या “चपरास” भी उल्लेखनीय है। इसका अर्थ यह है कि केवल वही व्यक्ति सच्चे अर्थों में शिक्षा देने का अधिकारी है जिसे भीतर से ईश्वर की प्रेरणा और शक्ति प्राप्त हो।

ऐसे व्यक्ति के शब्दों में प्रभाव होता है, क्योंकि उनका जीवन केवल उपदेशों पर नहीं, बल्कि अनुभव और आचरण पर आधारित होता है। वे केवल बातें नहीं करते, बल्कि अपने चरित्र और व्यवहार से लोगों के जीवन में परिवर्तन ला सकते हैं।

ज्ञानवान और ईश्वर से जुड़े हुए लोगों की तुलना “स्टीम बोट” से की गई है। एक छोटी नाव केवल स्वयं को पार लगा सकती है। लेकिन स्टीम बोट अनेक लोगों को साथ लेकर नदी पार कराती है।

उसी प्रकार सच्चे संत और ज्ञानी व्यक्ति केवल अपना कल्याण नहीं करते, बल्कि समाज के अनेक लोगों को भी आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में प्रेरित करते हैं। उनका जीवन दूसरों के लिए आशा और मार्गदर्शन का स्रोत बन जाता है।

स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी एक घटना भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। युवा अवस्था में उन्होंने अपनी शक्ति एक अन्य बालक को देने का प्रयास किया, जिसे श्री रामकृष्ण ने उचित नहीं माना।

इस घटना के माध्यम से यह शिक्षा मिलती है कि आध्यात्मिक शक्ति का उपयोग अत्यंत सावधानी और सही समय पर ही किया जाना चाहिए। पात्रता के बिना शक्ति देना या प्राप्त करना दोनों ही हानिकारक हो सकते हैं।

निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि सच्ची सेवा वही है जो अहंकार से नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति समर्पण और आंतरिक शुद्धता से की जाए। जब व्यक्ति स्वयं को साधना, विनम्रता और ईश्वर की कृपा से विकसित करता है, तभी वह समाज के लिए वास्तविक प्रेरणा और सहारा बन सकता है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button