डॉक्टरों ने बिना निशान वाली की थायराइड सर्जरी
सटीक थायराइड सर्जरी करने में एंडोक्राइन सर्जरी विभाग को मिली बड़ी कामयाबी

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। डॉक्टरों ने पहली बार बिना किसी निशान के थायराइड सर्जरी करने में बड़ी कामयाबी हासिल की। गुरुवार को
डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के एंडोक्राइन सर्जरी विभाग ने संस्थान की पहली एंडोस्कोपिक थायराइडेक्टोमी सफलतापूर्वक की है।
कांख और स्तन के माध्यम से की गई इस सर्जरी को सामान्यतः “स्कारलेस” (बिना निशान वाली) थायराइड सर्जरी के रूप में जाना जाता है।
अयोध्या की एक 19 वर्षीय युवती पर की गई यह प्रक्रिया सौंदर्य संबंधी और न्यूनतम आक्रामक (मिनिमली इनवैसिव ) सर्जिकल तकनीक के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति मानी जा है।
परंपरागत रूप से, थायराइड सर्जरी के लिए गर्दन पर एक चीरा लगाने की आवश्यकता होती है। जिससे अक्सर स्थायी निशान रह जाता है।
कई मरीजों, विशेष रूप से युवा महिलाओं के लिए, यह कॉस्मेटिक चिंता और मनोवैज्ञानिक परेशानी का कारण बन सकता है।
कांख और स्तन में तीन छोटे चीरों का उपयोग करके (जो कपड़ों के भीतर छिपे रहते हैं), गर्दन में दिखने वाले निशान से बचा जाता है। जिससे कॉस्मेटिक रूप से आकर्षक परिणाम मिलते हैं।
युवा मरीजों के लिए, ‘दागरहित’ होने का मनोवैज्ञानिक लाभ सर्जरी की नैदानिक सफलता जितना ही महत्वपूर्ण है। डॉक्टरों ने अयोध्या की रहने वाली एक 19 वर्षीय युवती मरीज को गर्दन के दाहिने हिस्से में थायराइड की गांठ (बिनाइन थायराइड नोड्यूल) हो गया था ।
जिसमें सर्जनों की टीम ने कांख और स्तन में तीन छोटे चीरे लगाए और गर्दन में स्थित थायराइड ग्रंथि को कांख के माध्यम से निकालने के लिए हाई-डेफिनिशन लैप्रोस्कोपिक उपकरणों का उपयोग किया।
इस प्रक्रिया में मरीज को सर्जरी के बाद बहुत कम दर्द हुआ और वह कुछ ही घंटों के भीतर सामान्य आहार लेने और दैनिक गतिविधियों को फिर से शुरू करने में सक्षम थी। इस तकनिकि से गर्दन पर कोई भी दृश्य निशान नहीं था।
इस विधि को अपनाने से जोखिम हुआ कम.
यह दृष्टिकोण ‘रिकरेंट लैरिंजियल नर्व’ और ‘पैराथायराइड ग्रंथियों’ को स्पष्ट रूप से देखने में मदद करता है। जिससे सर्जरी के बाद आवाज में भारीपन या कैल्शियम असंतुलन का जोखिम कम हो जाता है।
आधुनिक स्वास्थ्य सेवा के लिए एक विजन
प्रो. एसके मिश्रा के नेतृत्व में एंडोक्राइन सर्जरी विभाग, उत्तर प्रदेश के लिए विश्व स्तरीय, सस्ती और रोगी-केंद्रित तकनीक लाने के लिए प्रतिबद्ध है।
एंडोक्राइन सर्जरी विभाग की सर्जिकल टीम में डॉ. मिथुन राम, डॉ. अश्विनी रहालकर और डॉ. सारा इदरीस शामिल थे।
उन्होंने बताया कि हालांकि ये एंडोस्कोपिक प्रक्रियाएं तकनीकी रूप से चुनौतीपूर्ण हैं, लेकिन यह उन मरीजों के लिए एक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प है जो गर्दन पर स्थायी निशान से बचना चाहते हैं।



