स्वार्थ रहित भक्ति से ईश्वर की होती प्राप्ति- स्वामी मुक्तिनाथानंद
हमें ईश्वर के पास याचक नहीं

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। स्वार्थ रहित भक्ति से ईश्वर प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया गया। शनिवार को
शनिवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में भक्ति को ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल और प्रभावशाली साधन माना गया है।
किंतु भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप अहेतुकी भक्ति है। ‘अहेतुकी’ का अर्थ है, जिसके पीछे कोई कारण, स्वार्थ या अपेक्षा रहित हो।
अर्थात् ऐसा प्रेम और समर्पण जिसमें भक्त भगवान से धन, स्वास्थ्य, सफलता, नौकरी, यश या किसी सांसारिक सुख की कामना न करे, बल्कि केवल उनके प्रति प्रेम के कारण उनकी उपासना करे। यही निष्काम और शुद्ध भक्ति ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय होती है।
रामकृष्ण परमहंस ने स्पष्ट कहा कि जब तक मन में सांसारिक इच्छाएं और वासनाएं बनी रहती हैं, तब तक ईश्वर की वास्तविक अनुभूति कठिन है। जिस हृदय में केवल भगवान के लिए प्रेम हो और कोई स्वार्थ न हो, वही उनके निकट पहुंच सकता है। संसार की इच्छाए और ईश्वर की प्राप्ति एक साथ नहीं चल सकतीं।
इसलिए साधक को अपने मन को कामनाओं से मुक्त कर भगवान के चरणों में समर्पित करना चाहिए। स्वामी ने बताया कि श्रीमद्भगवद्गीता भी इसी सत्य की पुष्टि करती है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि केवल वेदों का अध्ययन, तप, दान या यज्ञ ही ईश्वर प्राप्ति के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
परमात्मा को वास्तव में जानने, देखने और उनमें एकाकार होने का मार्ग अनन्य भक्ति है। जब भक्त का मन पूर्ण रूप से भगवान में स्थित हो जाता है और उसका विश्वास अटूट होता है, तभी वह ईश्वर के वास्तविक स्वरूप का अनुभव कर सकता है।
अधिकांश लोग भगवान की पूजा किसी न किसी इच्छा की पूर्ति के लिए करते हैं। कोई धन चाहता है, कोई स्वास्थ्य, कोई सफलता या संतान। ऐसी प्रार्थना गलत नहीं है, परंतु यह शुद्ध भक्ति नहीं कहलाती।
जब भक्ति केवल कुछ पाने का माध्यम बन जाती है, तब वह प्रेम नहीं बल्कि एक प्रकार का व्यापार बन जाती है। सच्चा प्रेम वही है जिसमें देने की भावना हो, लेने की नहीं। भगवान से प्रेम का अर्थ है—उनकी इच्छा को स्वीकार करना और बिना किसी अपेक्षा के उनका स्मरण करना।
स्वामी ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस ने डॉक्टर सरकार के साथ अपने संबंध का उदाहरण देकर समझाया कि सच्चा प्रेम किसी लाभ या स्वार्थ पर आधारित नहीं होता। जैसे एक सच्चा मित्र बिना किसी अपेक्षा के प्रेम करता है, वैसे ही भक्त का संबंध भी भगवान से होना चाहिए।
जब प्रेम निस्वार्थ होता है, तभी उसमें आत्मीयता, विश्वास और समर्पण का वास्तविक आनंद मिलता है। अहेतुकी भक्ति का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए भी अपने कर्मों को ईश्वर को समर्पित करना है।
परिवार, समाज और अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए यदि मन भगवान के प्रेम में स्थिर रहे और कर्मों के फल की इच्छा न हो, तो जीवन स्वयं साधना बन जाता है। ऐसी भक्ति मन को शांति, संतोष और आंतरिक आनंद प्रदान करती है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि हमें भगवान के द्वार पर याचक बनकर नहीं, बल्कि प्रेमी बनकर जाना चाहिए। उनसे केवल उनका प्रेम मांगना चाहिए, न कि संसार की वस्तुएं।
निष्काम, निस्वार्थ और अहेतुकी भक्ति ही वह मार्ग है जो मनुष्य को ईश्वर के निकट ले जाता है और जीवन को सच्चे अर्थों में धन्य बना देता है। यही शुद्ध प्रेम भक्ति का सर्वोच्च आदर्श है और ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल तथा श्रेष्ठ मार्ग भी है।



