रजिस्ट्रार फर्म सोसाइटी कुलसचिव के आदेश को हाई कोर्ट ने लगाई रोक
कर्मचारी परिषद चुनाव पर उठाये सवालों को कोर्ट ने घेरा

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। केजीएमयू कर्मचारी परिषद पर रजिस्ट्रार फर्म सोसाइटी कुल सचिव द्वारा जारी आदेशों पर कोर्ट ने रोक लगा दी है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ की न्यायमूर्ति करुणेश सिंह पवार की पीठ ने सुनवाई करते हुए 1 जुलाई के विवादित आदेश के क्रियान्वयन एवं प्रभाव पर अगली सुनवाई तक अंतरिम रोक लगा दी है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि कर्मचारी परिषद के चुनाव संबंधी विवाद उत्पन्न होने पर कुलसचिव को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 की धारा 25(1) के अंतर्गत विवाद को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष संदर्भित करना चाहिए था, न कि स्वयं उसका निर्णय करना चाहिए था।
यह भी कहा गया कि पूर्व में स्वीकृत पदाधिकारियों की सूची के संबंध में बाद में पारित आदेश वस्तुतः समीक्षा के समान है, जबकि ऐसी समीक्षा का वैधानिक अधिकार उपलब्ध नहीं है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के उपरांत उच्च न्यायालय ने मामले को विचारणीय माना तथा प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर प्रतिशपथ-पत्र दाखिल करने का समय प्रदान किया है।
याचिकाकर्ता को आवश्यक होने पर दो सप्ताह के भीतर प्रत्युत्तर शपथ-पत्र दाखिल करने की अनुमति दी गई है। न्यायालय ने यह भी आदेश दिया है कि 01 जुलाई के विवादित आदेश के क्रियान्वयन एवं उसके प्रभाव पर अगली सुनवाई, 27 अगस्त तक अंतरिम रोक रहेगी।
बुधवार को कर्मचारी परिषद के अध्यक्ष विकास सिंह एवं महामंत्री अनिल कुमार ने संयुक्त रूप से जारी बयान में कहा कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ द्वारा पारित अंतरिम आदेश न्यायपालिका की निष्पक्षता एवं विधि के शासन में हमारे विश्वास को और मजबूत करता है।
न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के उपरांत 1 जुलाई के विवादित आदेश के क्रियान्वयन एवं प्रभाव पर अंतरिम रोक लगाई है।
उन्होंने कहा कि कर्मचारी परिषद का उद्देश्य सदैव लोकतांत्रिक परंपराओं, पारदर्शिता तथा कर्मचारियों के संवैधानिक एवं वैधानिक अधिकारों की रक्षा करना रहा है।
उन्होंने कहा कि परिषद ने न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष तथ्यों एवं विधिक आधार पर रखा है और आगे भी पूरी निष्ठा के साथ न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हुए अपना पक्ष प्रस्तुत करती रहेगी।
वहीं आदेश मिलते ही अध्यक्ष महामंत्री ने अपील करते हुए कहा कि किसी भी प्रकार की भ्रामक अथवा अपुष्ट सूचनाओं पर ध्यान न दें तथा केवल न्यायालय के आदेश एवं अधिकृत सूचनाओं पर ही विश्वास करें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि अंतिम निर्णय भी सत्य, तथ्यों एवं विधि के अनुरूप होगा।



