ईश्वर अपनी शक्ति से की जगत की रचना- मुक्तिनाथानन्द
निराकार का साकार होना, यह तर्क से नहीं

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। जीवन मरण और सृस्टि का बोध कराया गया। रविवार को
रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने वचनामृत में कहा कि सृष्टि के कर्ता कौन हैं। हम सबके मन में कभी न कभी यह प्रश्न उठता ही है कि हम कौन हैं।
कहाँ से आये हैं और इस सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माता कौन है और जन्म और मृत्यु का यह चक्र, सुख-दुःख का यह खेल, आखिर चला कौन रहा है। इस प्रश्न का उत्तर हमारे शास्त्रों और संतों ने एक स्वर में दिया है ईश्वर।
वही हमारे रचयिता हैं। जैसे कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है, वैसे ही ईश्वर ने अपनी ही शक्ति से इस जगत की रचना की है। हमारा जन्म होना, हमारा बड़ा होना, और अंत में इस शरीर को छोड़ देना, यह सब उसी की व्यवस्था है।
हम निमित्त मात्र हैं, कर्ता वही है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं। मैं ही सबका पिता, माता, धाता और पितामह हूँ। वही इस जन्म-मरण के चक्र को चला रहा है। उसे जानने पर ही इस चक्र से मुक्ति मिलती है।
स्वामी ने कहा कि दूसरा प्रश्न मन में आता है, अगर ईश्वर अनंत, असीम और सर्वव्यापी है, तो वह मनुष्य रूप में कैसे आ सकता है। अवतार के विषय में हम सोचते हैं कि अनंत कैसे अवतार के रूप में परिवर्तित हो सकता है।
यह हमारी बुद्धि से परे है। अनंत का शांत बनना, निराकार का साकार होना, यह तर्क से नहीं, श्रद्धा और अनुभव से समझा जाता है।
समुद्र अथाह है, लेकिन वही समुद्र का जल जब बादल बनकर बरसता है, तो एक लोटे में भी आ सकता है। लोटे में आने से समुद्र छोटा नहीं हो जाता। उसी प्रकार अनंत ईश्वर जब प्रेमवश भक्तों के लिए अवतार लेते हैं, तो वे शांत रूप में दिखते हैं, पर उनका अनंत स्वरूप ज्यों का त्यों बना रहता है।
स्वामी ने बताया कि इसी भाव को समझाते हुए रामकृष्ण परमहंस ने बड़ी सुंदर बात कही है। वे कहते हैं। जितना ही बढ़ जाओगे, ईश्वर की उपाधि उतनी ही कम देखोगे।
भक्त को पहले दशभुजा के दर्शन हुए। और भी बढ़कर उसने देखा, षड़भुजा मूर्ति। और भी बढ़कर देखा, द्विभुज गोपाल। जितना ही बढ़ रहा है, उतना ही ऐश्वर्य घट रहा है। और भी बढ़ा तब ज्योति के दर्शन हुए – कोई उपाधि नहीं।
इसका अर्थ है कि जैसे-जैसे साधक ईश्वर के निकट जाता है, वैसे-वैसे ईश्वर के बाहरी आडम्बर, ऐश्वर्य और उपाधियाँ कम होती जाती हैं। प्रारम्भ में हमें ईश्वर बड़ा, शक्तिशाली, दशभुजा वाला दिखता है।
फिर वह और सरल, और आत्मीय, द्विभुज गोपाल के रूप में दिखता है। और जब हम और भी निकट पहुँचते हैं, तो केवल प्रकाश, केवल प्रेम, केवल चैतन्य रह जाता है। वहाँ कोई रूप नहीं, कोई उपाधि नहीं। वही शुद्ध ब्रह्म है। अवतार इसी शुद्ध ब्रह्म की करुणा का सगुण रूप है।
स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण कहते थे कि हमारे जीवन का उद्देश्य – ईश्वर की अनुभूति है,तो फिर हमारा काम क्या है। हम क्यों आये हैं इस पर रामकृष्ण ने कहा है कि हमारा एकमात्र कर्तव्य ईश्वर को प्राप्त करना है।
धन कमाना, परिवार पालना, यह सब जीवन के साधन हैं, साध्य नहीं। साध्य तो ईश्वर-दर्शन है। वे हमारे भीतर ही विराजमान हैं। जैसे एक ही सूर्य आकाश में है, पर वह हजारों घड़ों के पानी में प्रतिबिम्बित होता है।
घड़े अनेक हैं, पर सूर्य एक ही है। वैसे ही एक ही ईश्वर हम सबके हृदय में प्रतिबिम्बित हो रहा है। वही हमारे भीतर बैठकर सब कुछ चला रहा है। हमारी साँसें, हमारे विचार, हमारी चेतना, सब उसी की शक्ति से चल रही है।
हम उसे बाहर मंदिर-मस्जिद में ढूंढते हैं, पर वह तो हमारे अंतरतम में ही बैठा है। उसे भीतर खोजना ही साधना है। स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण के अनुसार श्रवण, मनन और निदिध्यासन – धन्य जीवन का मार्ग है।
इस ईश्वर को कैसे पाया जाये। हमारे शास्त्रों ने तीन सरल उपाय बताये हैं। श्रवण, मनन और निदिध्यासन। ईश्वर को श्रवण करना चाहिए, चिंतन करना चाहिए और अनुभव करना चाहिए।
सबसे पहले श्रवण, सत्शास्त्रों को सुनना, संतों की वाणी को सुनना, रामकृष्ण-कथा, भागवत, गीता को सुनना। सुनने से मन में जिज्ञासा पैदा होती है। दूसरा है मनन यानी चिंतन। सुनी हुई बात पर एकांत में विचार करना।
क्या यह सत्य है, क्या ईश्वर सच में मेरे भीतर है। इस चिंतन से बुद्धि में निश्चय होता है और तीसरा है अनुभव यानी निदिध्यासन। केवल सुनने और सोचने से काम नहीं चलेगा। उसे अपने जीवन में उतारना होगा।
जप, ध्यान, प्रार्थना और निष्काम कर्म के द्वारा उस ईश्वर को अपने हृदय में अनुभव करना होगा। स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि जब यह तीनों (श्रवण, मनन और निदिध्यासन) होते हैं। तभी जीवन धन्य होता है।
अन्यथा मनुष्य जन्म व्यर्थ चला जाता है। जिसने ईश्वर को सुन लिया, सोच लिया और पा लिया, उसका जीवन सचमुच धन्य हो गया। उसके लिए जन्म-मरण का खेल समाप्त हो जाता है और वह आनंद स्वरूप में स्थित हो जाता है।



