मानव जीवन में धन जरुरी,संचय मिथ्या – मुक्तिनाथानन्द
धन जीवन का साधन है, साध्य नहीं

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। मानव जीवन में धन जरुरत और संचय मिथ्या बताया गया।
शुक्रवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मानव जीवन में धन का महत्वपूर्ण स्थान है।
भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धन आवश्यक है। इसके अतिरिक्त सामाजिक और धार्मिक कर्तव्यों को पूरा करने में भी धन उपयोगी होता है।
लेकिन जब धन आवश्यकता का साधन न रहकर जीवन का अंतिम लक्ष्य बन जाता है, तब वह मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में बाधा उत्पन्न कर सकता है। रामकृष्ण परमहंस ने धन अर्थात् ‘कांचन’ के प्रति आसक्ति से सावधान करते हुए उसके सही उपयोग और मानसिक त्याग का संदेश दिया है।
स्वामी ने कहा श्रीरामकृष्ण के अनुसार में धन स्वयं बुरा नहीं है। समस्या धन में नहीं, बल्कि उसके प्रति मनुष्य की आसक्ति में है।
धन का उपयोग यदि जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने, परिवार का पालन-पोषण करने, ईश्वर की सेवा करने तथा जरूरतमंदों की सहायता करने में किया जाए, तो वह उपयोगी और कल्याणकारी है।
परंतु धन को केवल जमा करते रहना, उसके प्रति अत्यधिक मोह रखना और उसे ही जीवन की सुरक्षा तथा सुख का आधार मान लेना मनुष्य को बंधन में डाल देता है।
अत्यधिक संग्रह की इच्छा मन में लोभ, भय और चिंता को जन्म देती है तथा मन को ईश्वर से दूर कर सकती है। गृहस्थ जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए पूर्ण रूप से धन का त्याग करना आवश्यक नहीं है।
उसके लिए रामकृष्ण मानसिक त्याग का मार्ग बताते हैं। इसका अर्थ है कि मनुष्य संसार में रहते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करे, धन कमाए और उसका उचित उपयोग करे, लेकिन उसके मन में धन के प्रति अत्यधिक मोह न हो।
इसे एक सुंदर उदाहरण से समझाया जा सकता है। नाव का पानी में रहना स्वाभाविक है, लेकिन यदि पानी नाव के भीतर आ जाए तो नाव डूब सकती है।
उसी प्रकार मनुष्य का संसार में रहना आवश्यक है, परंतु संसार और धन की आसक्ति उसके मन के भीतर प्रवेश कर जाए तो आध्यात्मिक जीवन प्रभावित हो सकता है।
स्वामी ने बताया रामकृष्ण ने धन के संग्रह के खतरे को समझाने के लिए मधुमक्खी और शहद का उदाहरण भी दिया। मधुमक्खियाँ परिश्रम करके शहद एकत्र करती हैं, लेकिन अंततः कोई दूसरा उसे ले जाता है।
इसी प्रकार मनुष्य जीवनभर धन इकट्ठा करने में लगा रहता है, लेकिन वह धन हमेशा उसके काम नहीं आता। कभी परिस्थितियाँ बदल जाती हैं और कभी दूसरे लोग उस धन का उपयोग करते हैं। इसलिए केवल संग्रह करते रहना बुद्धिमानी नहीं है।
धन का सदुपयोग ही उसके जीवन को सार्थक बनाता है।आध्यात्मिक जीवन का उद्देश्य धन का विरोध करना नहीं, बल्कि धन के प्रति सही दृष्टिकोण विकसित करना है। मनुष्य को समझना चाहिए कि धन जीवन का साधन है, साध्य नहीं।
धन से सुविधा प्राप्त की जा सकती है, लेकिन स्थायी शांति और ईश्वर का अनुभव केवल धन से प्राप्त नहीं किया जा सकता। सच्ची समृद्धि मन की शांति, संतोष, प्रेम, सेवा और ईश्वर-चिंतन में है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि हमें धन कमाना चाहिए, लेकिन ईमानदारी और विवेक के साथ; उसका उपयोग करना चाहिए, लेकिन लोभ के बिना; और आवश्यकता से अधिक संग्रह करने के बजाय उसका सदुपयोग समाज और मानवता के कल्याण में करना चाहिए।
गृहस्थ के लिए संसार में रहकर भी मन को ईश्वर में लगाना ही वास्तविक मानसिक त्याग है। जब धन हमारे हाथ में रहे, और हमारे मन पर अधिकार न करे, तभी धन जीवन के लिए वरदान बन सकता है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।



