ईश्वर मनुष्य से दूर नहीं – मुक्तिनाथानन्द
ईश्वर को प्राप्त करने के लिए आडंबर, तर्क या विद्वता पर्याप्त नहीं

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर प्राप्ति के लिए सत्यता और श्रद्धा भाव को बताया गया।
सोमवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस का संपूर्ण जीवन ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति और मानव जीवन को आध्यात्मिक दिशा देने का महान उदाहरण है।
उनके अनुसार ईश्वर मनुष्य से दूर नहीं हैं, बल्कि हमारे अत्यंत निकट हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि हमारा हृदय सरल, पवित्र और सच्चा हो। ईश्वर को पाने के लिए केवल बाहरी आडंबर, तर्क या विद्वता पर्याप्त नहीं है; इसके लिए सच्ची श्रद्धा, निष्कपट मन और ईमानदार प्रार्थना आवश्यक है।
स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण सरलता को आध्यात्मिक जीवन की एक बड़ी शक्ति मानते थे। बच्चों और सरल हृदय वाले भक्तों में उन्हें ईश्वर के प्रति सहज प्रेम दिखाई देता था।
बच्चे जिस प्रकार बिना किसी छल-कपट के अपने माता-पिता पर विश्वास करते हैं, उसी प्रकार यदि मनुष्य ईश्वर पर सरल और पूर्ण विश्वास रखे, तो उसके भीतर ईश्वर के प्रति निकटता का अनुभव उत्पन्न हो सकता है।
सरलता का अर्थ अज्ञान नहीं, बल्कि मन की निष्कपटता और अहंकार से मुक्ति है। ईश्वर की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है विषय-बुद्धि, अर्थात संसार के भोग-विलास और सांसारिक इच्छाओं में अत्यधिक आसक्ति।
मनुष्य जब धन, प्रतिष्ठा, सुख-सुविधा और अपनी इच्छाओं में इतना उलझ जाता है कि उसका पूरा ध्यान उन्हीं पर केंद्रित हो जाता है, तब उसका मन ईश्वर की ओर सहज रूप से नहीं जा पाता।
ईश्वर सदैव हमारे निकट हैं, लेकिन हमारी इच्छाएँ, अहंकार और आसक्तियाँ हमारे और ईश्वर के बीच दूरी का अनुभव पैदा करती हैं। इसलिए आध्यात्मिक जीवन का अर्थ संसार को छोड़ देना मात्र नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपनी आसक्ति और अहंकार को कम करना है।
स्वामी ने समझाया कि श्रीरामकृष्ण ने शुद्ध और अशुद्ध मन को समझाने के लिए दूध का सुंदर उदाहरण दिया। शुद्ध हृदय वाला व्यक्ति मानो शुद्ध दूध के समान है, जिसे ईश्वर की ओर लगाने में अधिक कठिनाई नहीं होती।
लेकिन जब मन सांसारिक इच्छाओं से मिश्रित हो जाता है, तो उसे साधना, विवेक और आत्मसंयम द्वारा शुद्ध करने की आवश्यकता पड़ती है। इससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर की प्राप्ति के मार्ग में मन की पवित्रता का विशेष महत्व है।
इस मार्ग में प्रार्थना का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सच्ची प्रार्थना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं है, बल्कि हृदय की गहराई से ईश्वर को पुकारना है। जब मनुष्य सरल और निष्कपट भाव से ईश्वर को याद करता है, तब उसकी प्रार्थना में एक विशेष शक्ति उत्पन्न होती है।
ऐसी प्रार्थना में दिखावा नहीं होता; उसमें केवल विश्वास, प्रेम और आत्मसमर्पण होता है। श्रीरामकृष्ण का संदेश यही है कि यदि मनुष्य सच्चे हृदय से ईश्वर को पुकारे, तो उसकी पुकार व्यर्थ नहीं जाती।
स्वामी ने कहा कि ईश्वर के अनुभव के तीन प्रमाण शास्त्र प्रमाण, अनुभव प्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाण में प्रत्यक्ष अनुभव को विशेष महत्व दिया जा सकता है।
केवल यह जानना कि ईश्वर हैं, पर्याप्त नहीं; मनुष्य को अपने जीवन में उनकी उपस्थिति का अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए। श्रीरामकृष्ण का जीवन इसी प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव का प्रेरक उदाहरण है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए कठिन बाहरी साधनों से अधिक आवश्यक है। सरल हृदय, शुद्ध विचार, सांसारिक आसक्ति पर संयम, अहंकार का त्याग और सच्ची प्रार्थना।
जब मनुष्य इन गुणों को अपने जीवन में उतारता है, तब उसे अनुभव होने लगता है कि ईश्वर कहीं दूर नहीं, बल्कि उसके अपने हृदय में विद्यमान हैं। यही श्रीरामकृष्ण परमहंस के जीवन और शिक्षाओं का सबसे सरल और गहरा संदेश है।



