केवल पुस्तकों का अध्ययन ही सच्चा ज्ञान नहीं -मुक्तिनाथानन्द
वास्तविक ज्ञान अनुभव और आत्मानुभूति से होता प्राप्त

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। केवल पुस्तकों का अध्ययन ही सच्चा ज्ञान नहीं मिल सकता।
शनिवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि केवल पुस्तकों का अध्ययन ही सच्चा ज्ञान नहीं देता, बल्कि
वास्तविक ज्ञान अनुभव और आत्मानुभूति से प्राप्त होता है। मनुष्य अनेक ग्रंथ पढ़ सकता है, परंतु जब तक वह उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारकर अनुभव नहीं करता, तब तक उसका ज्ञान अधूरा रहता है। यही अनुभवजन्य ज्ञान व्यक्ति को सत्य के निकट ले जाता है और उसके जीवन को सार्थक बनाता है।
स्वामी ने बताया कि भारतीय दर्शन में ज्ञान को दो भागों में विभाजित किया गया है—अपरा विद्या और परा विद्या। अपरा विद्या वह सांसारिक या लौकिक ज्ञान है, जिसकी सहायता से मनुष्य शिक्षा प्राप्त करता है, रोजगार करता है और समाज में अपना जीवन सुचारु रूप से चलाता है।
यह जीवन के लिए आवश्यक है और व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाती है। दूसरी ओर परा विद्या वह ज्ञान है, जिसके द्वारा मनुष्य ईश्वर, ब्रह्म या परम सत्य का बोध करता है।
यह आत्मिक उन्नति और जीवन के अंतिम उद्देश्य की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। रामकृष्ण परमहंस का मानना था कि मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति होना चाहिए। जब व्यक्ति परम सत्य का अनुभव कर लेता है, तब उसके लिए संसार के अनेक रहस्य स्वतः स्पष्ट होने लगते हैं।
इसलिए उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया, किंतु सांसारिक ज्ञान का भी महत्व स्वीकार किया। उनका संदेश था कि दोनों प्रकार के ज्ञान में संतुलन होना चाहिए, परंतु प्राथमिकता आत्मिक विकास को मिलनी चाहिए।
स्वामी ने बताया कि इस संदर्भ में डॉ. महेंद्र लाल सरकार का मत भी उल्लेखनीय है। उन्होंने स्वीकार किया कि रामकृष्ण का ज्ञान केवल पुस्तकों से अर्जित नहीं था, बल्कि प्रकृति और ईश्वर के साथ उनके प्रत्यक्ष अनुभव का परिणाम था।
उन्होंने यह भी कहा कि महान आविष्कार और नई खोजें केवल पुस्तकों को याद करने से नहीं होतीं, बल्कि प्रकृति का गहन अवलोकन, जिज्ञासा और अनुभव से जन्म लेती हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि अनुभवजन्य ज्ञान का महत्व हर क्षेत्र में है।
आज के आधुनिक युग में, जहाँ सूचना और पुस्तकें आसानी से उपलब्ध हैं, वहाँ भी केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य जीवन में विवेक, नैतिकता और अनुभव का विकास होना चाहिए।
यदि व्यक्ति अपने ज्ञान को व्यवहार में उतारे और आत्मचिंतन के माध्यम से सत्य की खोज करे, तभी वह पूर्ण ज्ञान की ओर अग्रसर हो सकता है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि जीवन में अपरा विद्या और परा विद्या दोनों का अपना-अपना महत्व है। सांसारिक ज्ञान हमें जीवन जीना सिखाता है, जबकि आध्यात्मिक ज्ञान जीवन का उद्देश्य बताता है।
रामकृष्ण परमहंस का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि सच्चा ज्ञान वही है, जो अनुभव, आत्मबोध और सत्य की अनुभूति से प्राप्त हो। यही ज्ञान मनुष्य को संपूर्ण और सफल जीवन की ओर ले जाता है।



