भारत में कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित लोगों की संख्या लगभग 10 से 12 लाख
भारत में प्रतिवर्ष लगभग एक से दो लाख कॉर्निया की आवश्यकता

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। भारत में कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित लोगों की संख्या लगभग 10 से 12 लाख है।
शनिवार को एसजीपीजीआई में आयोजित उत्तर प्रदेश में कॉर्नियल दान और प्रत्यारोपण की स्थिति पर संवाद तथा भावी दिशा” विषय पर एक राज्य-स्तरीय मंथन सत्र चलाया गया। सत्र के दौरान
आधिकारिक रजिस्ट्री रिपोर्टिंग के अनुसार नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन के डेटा में उल्लेख है कि वर्ष 2023–24 में भारत में 49,315 कॉर्निया दाताओं से प्राप्त किए गए।
इनमें से 27,394 कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त पाए गए और वास्तविक सर्जरी में उपयोग किए गए। इसका अर्थ है कि प्राप्त किए गए कॉर्निया और वास्तव में उपयोग किए गए कॉर्निया के बीच एक उल्लेखनीय अंतर है, जो प्रायः गुणवत्ता, संक्रमण, या समयबद्धता संबंधी कारणों से होता है।
नोट्टो द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, भारत में कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित रोगियों की आवश्यकता पूरी करने के लिए प्रतिवर्ष लगभग एक से दो लाख कॉर्निया की आवश्यकता होती है। जबकि कई आधिकारिक आकलनों में कम से कम एक लाख कॉर्निया प्रतिवर्ष आवश्यकता जाहिर की हैं।
भारत में कुल कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित लोगों की संख्या लगभग 10 से 12 लाख..
कॉर्नियल अंधत्व का भार, जैसा कि NOTTO और राष्ट्रीय अंधत्व नियंत्रण कार्यक्रम के अनुमानों में दर्शाया गया है, अत्यंत गंभीर है। भारत में कुल कॉर्नियल अंधत्व से पीड़ित लोगों की संख्या लगभग 10 से 12 लाख (1 से 1.2 मिलियन) आंकी गई है।
प्रतिवर्ष लगभग 20 हज़ार से 25 हज़ार नए मामले जुड़ते हैं। कॉर्नियल अंधत्व भारत में बाल्यावस्था अंधत्व का एक प्रमुख कारण भी है। आधिकारिक आवश्यकता के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग एक लाख कॉर्निया प्रत्यारोपण की जरूरत होती है।
भारत में कॉर्नियल अंधत्व के प्रमुख कारण..
कॉर्निया संक्रमण (बैक्टीरियल, फंगल, वायरल)आघात एवं रासायनिक चोटें, मोतियाबिंद सर्जरी के बाद उत्पन्न जटिलताएँ, विटामिन-ए की कमी (विशेषकर बच्चों में),जन्मजात कॉर्नियल विकार पारंपरिक हानिकारक नेत्र उपचार प्रथाएँ, ये सभी कारण मिलकर भारत में कॉर्नियल अंधत्व की समस्या को एक महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनाते हैं।
विषय विशेषज्ञों का मानना है कि कॉर्नियल अंधत्व और प्रत्यारोपण के बीच की खाई को पाटना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि कॉर्नियल अंधत्व अधिकांश मामलों में रोके जाने योग्य और उपचार योग्य है, फिर भी दाता ऊतक की कमी और तंत्र की अक्षमताओं के कारण हजारों लोग दृष्टिबाधित बने रहते हैं।
प्रत्येक सफल कॉर्निया प्रत्यारोपण केवल दृष्टि ही नहीं लौटाता, बल्कि स्वतंत्रता, शिक्षा, रोजगार के अवसर और सम्मान भी पुनर्स्थापित करता है। विशेषकर युवाओं और कार्यशील आयु वर्ग के लोगों में।
नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट आर्गेनाइजेशन जैसे संस्थानों के माध्यम से समन्वय को सुदृढ़ करना तथा नेशनल प्रोग्राम फॉर कण्ट्रोल ऑफ़ ब्लाइंडनेस एंड विसुअल इम्पैरमेंट के अंतर्गत प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना प्रतीक्षा सूची को कम कर सकता है, दान किए गए कॉर्निया के बेहतर उपयोग को बढ़ावा दे सकता है और इस अमूल्य दान के नैतिक एवं उचित उपयोग को सुनिश्चित कर सकता है।
इसलिए इस अंतर को समाप्त करना केवल एक चिकित्सीय आवश्यकता नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण जनस्वास्थ्य प्राथमिकता है, जो समानता, आर्थिक उत्पादकता और सामाजिक कल्याण को आगे बढ़ाती है।
इस कार्यक्रम का संयुक्त रूप से आयोजन राज्य अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन उत्तर प्रदेश अस्पताल प्रशासन विभाग, तथा नेत्र विज्ञान विभाग, संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान द्वारा किया गया।
इस सत्र में उत्तर प्रदेश के विभिन्न सरकारी संस्थानों से नेत्र रोग विशेषज्ञों, नीति-निर्माताओं, प्रत्यारोपण समन्वयकों, अस्पताल प्रशासकों तथा अन्य प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा राज्य में कॉर्नियल दान एवं प्रत्यारोपण सेवाओं की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों तथा सुदृढ़ीकरण के लिए रणनीतिक कार्ययोजना पर विस्तृत विचार-विमर्श किया।
प्रमुख सचिव ने सत्र का किया उद्घाटन..
सत्र का उद्घाटन अमित कुमार घोष चिकित्सा शिक्षा विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार एवं संस्थान निदेशक प्रो. आरके धीमन, डॉ. अनिल कुमार, निदेशक, नोट्टो , प्रो. शालीन कुमार, डीन, प्रो. राजेश हर्षवर्धन, संयुक्त निदेशक, सॉट्टो उप्र एवं
चिकित्सा अधीक्षक, प्रो. विकास कन्नौजिया, विभागाध्यक्ष, नेत्र विज्ञान विभाग तथा डॉ. शेफाली मजूमदार, एसोसिएट प्रोफेसर, नेत्र विज्ञान, एसएनएमसी, आगरा, की उपस्थिति में किया गया।
सत्र का शुभारंभ डॉ. राजेश हर्षवर्धन, संयुक्त निदेशक, सॉट्टो उप्र एवं संस्थान चिकित्सा अधीक्षक के स्वागत उद्बोधन से शुरू हुआ। उन्होंने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में नेत्र देखभाल का दृष्टिकोण केवल उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक परिवर्तन की दिशा में प्रयास है।
जहाँ रोकथाम को प्राथमिकता दी जाए, सेवाओं का विकेंद्रीकरण हो, प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग हो तथा कोई भी दान किया गया कॉर्निया अनुपयोगी न रहे। इसके लिए संस्थानों के बीच सुदृढ़ समन्वय, जन-जागरूकता में वृद्धि तथा नेत्रदान को सामाजिक दायित्व के रूप में अपनाने की संस्कृति विकसित करना आवश्यक है।
इसके पश्चात प्रो. विकास कन्नौजिया, विभागाध्यक्ष, नेत्र विज्ञान विभाग ने कहा कि यद्यपि शल्य-विशेषज्ञता एवं संस्थागत क्षमता में निरंतर सुधार हो रहा है, परंतु वास्तविक चुनौती जन-जागरूकता को सुदृढ़ करने,
संभावित दाताओं की पहचान प्रणाली को मजबूत करने, कॉर्निया प्राप्ति तंत्र को प्रभावी बनाने तथा स्वास्थ्य तंत्र के विभिन्न स्तरों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने में निहित है।
उन्होंने कॉर्नियल संक्रमण एवं आघात की रोकथाम तथा समयबद्ध उपचार के साथ-साथ स्वैच्छिक नेत्रदान को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर बल दिया।
डॉ. शेफाली मजूमदार, एसोसिएट प्रोफेसर, नेत्र विज्ञान विभाग, एसएनएमसी, आगरा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इन कमियों को दूर करने के लिए डेटा-आधारित दृष्टिकोण आवश्यक है।
जिसमें डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली को सुदृढ़ करना, अस्पताल-आधारित दाता पहचान को बेहतर बनाना, प्रत्यारोपण समन्वयकों का प्रशिक्षण सुदृढ़ करना तथा सभी जनपदों में सेवाओं की समान उपलब्धता सुनिश्चित करना शामिल है।
प्रो. शालीन कुमार, डीन ने कहा कि नेत्रदान की प्रतिज्ञा को वास्तविक प्रत्यारोपण में परिवर्तित करना केवल एक चिकित्सीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक समन्वित मानवीय प्रयास है।
डॉ. अनिल कुमार, निदेशक, नोट्टो ने कहा कि अंग एवं ऊतक दान की सुदृढ़ संस्कृति विकसित करने के लिए केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र के प्रत्येक स्तर पर प्रभावी समन्वय आवश्यक है।
प्रो. आरके धीमन, निदेशक ने कहा कि प्रत्यारोपण समन्वयक सहानुभूतिपूर्ण मार्गदर्शन, समयबद्ध प्राप्ति प्रक्रिया तथा नियामकीय अनुपालन सुनिश्चित कर प्रणाली में विश्वास को सुदृढ़ करते हैं तथा दान की गरिमा को बनाए रखते हैं। कॉर्नियल प्रत्यारोपण की प्रक्रिया में वे संकल्प को प्रकाश में परिवर्तित करने वाली महत्वपूर्ण मानवीय कड़ी हैं।
अंततः अमित कुमार घोष ने कहा कि आज की सामूहिक प्रतिबद्धता उत्तर प्रदेश के लिए एक उज्ज्वल एवं दृष्टि-सम्पन्न भविष्य का आधार बनेगी।
गैर-सरकारी संगठन, व्यावसायिक संघ, नेत्र देखभाल संस्थान एवं सामुदायिक समूह जन-जागरूकता बढ़ाने, परिवारों को परामर्श देने तथा संभावित दाताओं की पहचान होने पर समन्वित कार्रवाई सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्थाओं के बीच साझेदारी से नेत्रदान के प्रति सकारात्मक वातावरण का निर्माण होगा तथा कॉर्नियल प्रत्यारोपण सेवाओं के विस्तार में सहायता मिलेगी।
वैज्ञानिक सत्र के दौरान शामिल विशेषज्ञों में..
वैज्ञानिक सत्रों में राज्य के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों—प्रो. शालिनी मोहन (निदेशक, इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी, जीएसवीएम, कानपुर), प्रो. एसपी सिंह (रीजनल
इंस्टीट्यूट ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी, प्रयागराज), प्रो. अल्का गुप्ता (एलएलआरएमसी, मेरठ), डॉ. शेफाली मजूमदार (एसएनएमसी आगरा), डॉ. अभिषेक चंद्रा (निदेशक, नेत्रोदय द आई सिटी, वाराणसी) सहित अन्य विशेषज्ञों ने सहभागिता की।



