हमारी वास्तविक सत्ता आत्मा – मुक्तिनाथानन्द
ईश्वर से केवल शुद्ध प्रेम मांगना चाहिए

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। शारीरिक बंधन से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त किया गया। गुरुवार को
के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि हम अक्सर अपने आप को शरीर समझते हैं, पर रामकृष्ण बताते हैं कि हमारी वास्तविक सत्ता आत्मा है जबकि शरीर नाशवान है।
जब मनुष्य सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठता है, तब उसे यह यह बोध होता है। स्वामी ने बताया कि जैसे सूखे नारियल का गिरी खोल से अलग हो जाता है, वैसे ही साधना से आत्मा शरीर के मोह से मुक्त हो जाती है।
जब तक हम “मैं शरीर हूँ” इस भाव में रहते हैं, तब तक दुऊख और बंधन रहता है। चमत्कारिक शक्तियों या सिद्धियों के पीछे भागना आध्यात्मिक उन्नति में बाधा है। ये शक्तियां अहंकार बढ़ाती हैं और ईश्वर से दूर ले जाती हैं।
जब साधक चेतना की उच्च अवस्था में पहुंच जाता है, तो वह शरीर को केवल मांस और हड्डियों का ढांचा मानने लगता है। श्री रामकृष्ण ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में गले के कैंसर जैसी पीड़ा को सहते हुए भी यही दिखाया।
शरीर की असुविधा उन्हें विचलित नहीं कर पाई, क्योंकि वे शरीर से तादात्म्य नहीं रखते थे। यह भ्रम ही दुःख का कारण है कि “मैं शरीर हूं”। जब तक हम इस भाव में रहते हैं, तब तक हमें बीमारी, बुढ़ापा और मृत्यु का भय सताता है।
परन्तु जैसे ही हम समझते हैं कि हम आत्मा हैं, शरीर तो केवल एक वस्त्र के समान है जिसे समय-समय पर बदलना है, वैसे ही भय समाप्त हो जाता है। रामकृष्ण ने कहा था। “खोल से गिरी अलग हो जाए तो आवाज नहीं आती। इसी प्रकार साधना से मनुष्य शरीर की आसक्ति से मुक्त हो जाता है।
स्वामी ने बताया कि आज कई लोग चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करने के पीछे भागते हैं पर रामकृष्ण ने सिद्धियों को “विष्ठा के समान” बताया।ये शक्तियां साधक को उसके लक्ष्य – ईश्वर प्राप्ति – से भटका देती हैं। सिद्धि आने पर अहंकार बढ़ता है और व्यक्ति “मैं कुछ कर सकता हूं” के भाव में फंस जाता है।
इससे भक्ति और समर्पण का भाव नष्ट हो जाता है। सच्चा साधक सिद्धि नहीं, शुद्ध भक्ति चाहता है। शरीर की परवाह न करके और सिद्धियों की इच्छा त्याग कर ही हम श्री रामकृष्ण के बताए मार्ग पर चल सकते हैं। स्वामी ने समझाया कि सच्चे आध्यात्मिक जीवन का एकमात्र उचित मार्ग निष्काम भक्ति है।
रामकृष्ण देव सदा यही शिक्षा देते थे कि ईश्वर से केवल एक ही चीज मांगनी चाहिए,अहैतुकी भक्ति। अर्थात बिना किसी स्वार्थ के, बिना किसी कामना के प्रेम। दूसरी बात जो बहुत महत्वपूर्ण है, वह है मन की रक्षा करना। आध्यात्मिक साधना करते समय कई बार व्यक्ति को कुछ विशेष गुण या शक्तियां प्राप्त हो सकती हैं।
मन में लालच आ सकता है कि “इनका उपयोग अपने लाभ के लिए करूं। पर यही सबसे बड़ी परीक्षा है। श्री रामकृष्ण कहते थे कि अगर साधक इन आध्यात्मिक उपहारों को नाम, यश या धन कमाने में लगा दे, तो वह अपने दिव्य उद्देश्य से भटक जाता है।
फिर साधना का सारा फल नष्ट हो जाता है। इसलिए सच्चा साधक हर समय प्रार्थना करता है। हे प्रभु, मुझे केवल तुम्हारी भक्ति दो। मुझे सांसारिक मोह और अहंकार से बचाओ। यही भक्ति का शुद्ध मार्ग है, जो सीधे ईश्वर तक ले जाता है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण की शिक्षाओं का सार यही है कि साधक को शरीर के मोह से ऊपर उठना होगा।शरीर नाशवान है, हम आत्मा हैं। इस बोध से ही भय और दुख समाप्त होते हैं। सिद्धियों और चमत्कारिक शक्तियों के पीछे भागना आध्यात्मिक पतन का कारण है।
ये अहंकार बढ़ाकर हमें ईश्वर से दूर करती हैं। एकमात्र सच्चा मार्ग निष्काम भक्ति है। ईश्वर से केवल शुद्ध प्रेम और समर्पण मांगें, न कि सांसारिक लाभ। मन को सांसारिक लालच से बचाकर रखें।



