गुरु केवल ज्ञान देने वाला ही नहीं,शिष्य के जीवन का पथ प्रदर्शक – मुक्तिनाथानन्द
गुरु की कृपा असंभव को भी संभव बना देती

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। जीवन में गुरु के महत्व को बताया गया।
मंगलवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
गुरु केवल ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह शिष्य के जीवन को दिशा देकर उसे ईश्वर की ओर अग्रसर करता है। श्रीरामकृष्ण परमहंस ने अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से गुरु-शिष्य संबंध की अद्भुत व्याख्या प्रस्तुत की।
उन्होंने बताया कि सभी आचार्य समान नहीं होते, बल्कि उनके कार्य और करुणा के आधार पर उनकी विभिन्न श्रेणियाँ होती हैं। उनका स्वयं का जीवन सर्वोत्तम आचार्यत्व का जीवंत उदाहरण है।
रामकृष्ण ने आचार्यों को चार श्रेणियों में विभाजित किया है। प्रथम श्रेणी अधम आचार्य की है, जो केवल उपदेश देकर अपने कर्तव्य की समाप्ति मान लेते हैं।
वे शिष्य की प्रगति या कठिनाइयों की ओर विशेष ध्यान नहीं देते। दूसरी श्रेणी मध्यम आचार्य की है, जो शिष्य की स्थिति का ध्यान रखते हैं, उसे समझाते हैं तथा सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।
तीसरी श्रेणी उत्तम आचार्य की है, जो आवश्यकता पड़ने पर कठोरता का भी प्रयोग करते हैं और शिष्य को साधना में दृढ़ता से लगाते हैं।
इन सबसे ऊपर सर्वोत्तम आचार्य या अवतार पुरुष होते हैं, जो केवल मार्गदर्शन ही नहीं करते, बल्कि अपनी असीम कृपा से शिष्य का संपूर्ण भार स्वयं ग्रहण कर लेते हैं और उसे आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस स्वयं ऐसे ही सर्वोत्तम आचार्य थे। उनके पास आने वाले शिष्य को केवल अपने प्रयासों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था, बल्कि ठाकुर की कृपा ही उसके जीवन का आधार बन जाती थी।
वे प्रत्येक व्यक्ति की प्रकृति, परिस्थिति और आध्यात्मिक पात्रता के अनुसार उसका मार्गदर्शन करते थे। उनका उद्देश्य किसी पर नियम थोपना नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और ईश्वर-भक्ति के माध्यम से उसके जीवन में परिवर्तन लाना था।
स्वामी ने बताया कि इस सत्य का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण गिरीश चंद्र घोष हैं। वे सांसारिक दुर्बलताओं और अनेक अवगुणों से घिरे हुए थे, किंतु श्रीरामकृष्ण ने उन्हें कभी निराश नहीं किया।
उन्होंने गिरीश को पूर्ण आत्मसमर्पण का मार्ग दिखाया। ठाकुर की असीम कृपा और विश्वास ने उनके जीवन को इतना बदल दिया कि वे महान भक्तों में गिने जाने लगे। यह घटना सिद्ध करती है कि सच्चे गुरु के लिए शिष्य का अतीत नहीं, बल्कि उसका समर्पण अधिक महत्वपूर्ण होता है।
इसी प्रकार कालीपद घोष का जीवन भी गुरु-कृपा की अद्भुत मिसाल है। वे मद्यपान के आदी थे, परंतु रामकृष्ण ने उन्हें तिरस्कृत नहीं किया।
उन्होंने उन्हें अपनाया और अंत समय में अपने वचन के अनुसार उनका मार्गदर्शन किया। इसी प्रकार सुरेन्द्रनाथ मित्र को भी उन्होंने बलपूर्वक शराब छोड़ने के लिए नहीं कहा।
उन्होंने केवल इतना सुझाव दिया कि जो कुछ भी ग्रहण करें, पहले उसे माँ को अर्पित करें। इस सरल साधना ने धीरे-धीरे उनके भीतर ऐसा परिवर्तन उत्पन्न किया कि उनका जीवन आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर हो गया।
इन सभी घटनाओं से स्पष्ट होता है कि रामकृष्ण का आचार्यत्व केवल उपदेशों तक सीमित नहीं था।
वे शिष्य के हृदय को स्पर्श करते थे और उसकी आंतरिक शक्ति को जागृत कर देते थे। उनकी करुणा, धैर्य और प्रेम ने असंख्य लोगों के जीवन को बदल दिया। वे किसी व्यक्ति के दोषों को नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी दिव्यता को देखते थे।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण का संदेश यही है कि यदि मनुष्य सच्चे हृदय से ईश्वर और गुरु के चरणों में समर्पित हो जाए, तो उसका आध्यात्मिक कल्याण निश्चित है।
गुरु की कृपा असंभव को भी संभव बना सकती है। इसलिए हमें उनके दिव्य आचार्यत्व को समझते हुए श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के साथ आध्यात्मिक जीवन का मार्ग अपनाना चाहिए। यही उनके जीवन और शिक्षाओं का वास्तविक सार है।



