गुरु केवल व्यक्ति नहीं – मुक्तिनाथानन्द
गुरु हमारे जीवन के ध्रुवतारा

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। गुरु पूर्णिमा पर गुरु के महत्व का वर्णन किया गया।
बुधवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु के स्वरूप और महत्त्व का स्मरण करना भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की एक महान विशेषता है।
गुरु केवल वह व्यक्ति नहीं है जो हमें बाहरी संसार का ज्ञान देता है, बल्कि सच्चा गुरु वह है जो हमारे भीतर अज्ञान के अंधकार को दूर कर आत्मज्ञान का प्रकाश प्रज्वलित करता है।
इसी दृष्टि से रामकृष्ण को ‘जगतगुरु’ अथवा ‘सार्वभौमिक गुरु’ के रूप में समझना अत्यंत सार्थक है। स्वामी ने बताया कि ‘गुरु’ शब्द का सामान्य अर्थ है,जो अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश प्रदान करे ।
मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन केवल बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप के प्रति अज्ञान है। गुरु इस अज्ञान को दूर करके व्यक्ति को उसके सत्य स्वरूप की ओर ले जाता है। वह केवल उपदेश नहीं देता, बल्कि अपने जीवन और आचरण से सत्य का मार्ग दिखाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से परम गुरु स्वयं ईश्वर हैं, जिन्हें सच्चिदानंद कहा गया है। मनुष्य के जीवन में अनेक शिक्षक, मार्गदर्शक और संत आते हैं, लेकिन वे सभी अंततः उसी परम सत्य की ओर ले जाने वाले माध्यम हैं।
रामकृष्ण का जीवन इसी महान सत्य का प्रत्यक्ष उदाहरण है। उन्होंने विभिन्न आध्यात्मिक साधनाओं का अनुभव करके यह दिखाया कि मनुष्य अनेक मार्गों से ईश्वर तक पहुँच सकता है। स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण को सार्वभौमिक गुरु कहने का एक महत्त्वपूर्ण कारण उनकी करुणा और आध्यात्मिक शक्ति है।
उनका उद्देश्य केवल किसी एक व्यक्ति, संप्रदाय या समुदाय का मार्गदर्शन करना नहीं था, बल्कि मानवता को ईश्वर की ओर प्रेरित करना था। उनका जीवन यह संदेश देता है कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को विभाजित करना नहीं, बल्कि उसके भीतर प्रेम, श्रद्धा, करुणा और एकत्व की भावना उत्पन्न करना है।
गुरु के स्वरूप को तीन प्रकारों के उदाहरण से भी समझाया जा सकता है। जैसे चिकित्सकों में कोई केवल औपचारिक रूप से उपचार करता है, कोई रोगी को समझाकर औषधि लेने के लिए प्रेरित करता है और कोई अत्यंत दृढ़ता से रोगी का उपचार पूरा करवाता है।
उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्यों का अलग-अलग स्तर पर मार्गदर्शन करते हैं। श्रेष्ठ गुरु शिष्य को आध्यात्मिक मार्ग पर तब तक प्रेरित करते हैं, जब तक वह अपने लक्ष्य की ओर आगे न बढ़ जाए। रामकृष्ण का जीवन इसी आदर्श गुरु-स्वरूप का प्रतीक है।
इस संदर्भ में रामकृष्ण और स्वामी विवेकानंद का संबंध अत्यंत प्रेरणादायक है। प्रारंभ में विवेकानंद के मन में अनेक प्रश्न और शंकाएँ थीं। वे सत्य को प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते थे। रामकृष्ण ने उनके प्रश्नों को दबाया नहीं, बल्कि प्रेम, अनुभव और आध्यात्मिक शक्ति के माध्यम से उन्हें सत्य की अनुभूति की दिशा में आगे बढ़ाया।
गुरु के स्नेह और मार्गदर्शन ने नरेंद्रनाथ के जीवन को परिवर्तित कर उन्हें स्वामी विवेकानंद के रूप में विश्व के सामने प्रस्तुत किया। यह गुरु-शिष्य संबंध बताता है कि सच्चा गुरु शिष्य को अपने ऊपर निर्भर नहीं बनाता, बल्कि उसकी अंतर्निहित शक्ति को जागृत करता है।
स्वामी ने समझाया कि गुरु और शिष्य के संबंध में श्रद्धा और विश्वास का भी विशेष महत्त्व है*। जब शिष्य अपने गुरु के प्रति सच्ची निष्ठा रखता है, तब गुरु उसके लिए ईश्वर तक पहुँचने का सेतु बन सकता है। गुरु मनुष्य के जीवन में ध्रुवतारे की तरह होता है जो कठिन परिस्थितियों में भी दिशा दिखाता है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण का सार्वभौमिक संदेश यही है कि ईश्वर ही परम गुरु हैं और सच्चा गुरु मनुष्य को उसी परम सत्य तक पहुँचने का मार्ग दिखाता है।
गुरु पूर्णिमा हमें केवल गुरु को प्रणाम करने का अवसर नहीं देती, बल्कि यह आत्मचिंतन का भी दिन है कि हम अपने जीवन में गुरु के बताए सत्य, प्रेम, सेवा और साधना के मार्ग को कितना अपना रहे हैं। यदि गुरु हमारे जीवन का ध्रुवतारा बन जाएँ
और उनके आदर्श हमारे आचरण में उतर जाएँ, तो हमारा जीवन भी अज्ञान से ज्ञान, संकीर्णता से व्यापकता और बंधन से मुक्ति की ओर अग्रसर हो सकता है।



