ईश्वर प्राप्ति को शरणागति आवश्यक – मुक्तिनाथानन्द
समर्पण भाव ही मनुष्य के जीवन को बनाता सफल

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया गया।
मंगलवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने रामकृष्ण वचनामृत के आधार पर ईश्वर-प्राप्ति के अत्यंत सरल और व्यावहारिक मार्ग का सुंदर विवेचन किया है।
उन्होंने कहा कि ईश्वर को प्राप्त करना कठिन नहीं है, बल्कि उसके लिए सच्चा विश्वास, समर्पण और शरणागति आवश्यक है। जब मनुष्य अपने जीवन का केंद्र ईश्वर को बना लेता है, तब आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग सहज हो जाता है।
सबसे पहले स्वामी ने ईश्वर में दृढ़ विश्वास की आवश्यकता पर बल दिया। उनका कहना है कि ईश्वर चाहे साकार रूप में हों या निराकार, यदि साधक के मन में उनके अस्तित्व के प्रति अटूट विश्वास है, तो वह अवश्य ही ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक जीवन की नींव यही विश्वास है। संदेह मनुष्य को लक्ष्य से दूर ले जाता है, जबकि विश्वास उसे ईश्वर के निकट पहुँचाता है।
इसके बाद स्वामी ने शरणागति के महत्व को समझाया। केवल विश्वास पर्याप्त नहीं है,उसके साथ पूर्ण आत्मसमर्पण भी आवश्यक है।
भगवद्गीता के सातवें अध्याय के चौदहवें श्लोक का उल्लेख करते हुए बताया गया कि भगवान की माया अत्यंत कठिन है, परंतु जो उनकी शरण में जाता है, वही इस माया को पार कर सकता है।
इसलिए ईश्वर की शरण ग्रहण करना ही जीवन के सभी बंधनों से मुक्त होने का सर्वोत्तम उपाय है। स्वामी ने शरणागति के छह प्रमुख अंगों का भी वर्णन किया, जो प्रत्येक साधक के लिए मार्गदर्शक हैं।
पहला है अनुकूल्य संकल्प। अर्थात् जो कार्य ईश्वर-प्राप्ति में सहायक हों, उन्हें करने का दृढ़ निश्चय करना। सत्संग, जप, ध्यान, प्रार्थना और सदाचार जैसे कार्य साधक को ईश्वर के निकट ले जाते हैं। दूसरा है प्रतिकूल वर्जन।
अर्थात् जो बातें या आदतें आध्यात्मिक जीवन में बाधा बनती हैं, उनका त्याग करना। क्रोध, अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और बुरी संगति से दूर रहना साधना की सफलता के लिए आवश्यक है। तीसरा अंग है आत्म-निक्षेप, अर्थात् अपने तन, मन, धन और संपूर्ण जीवन को भगवान के चरणों में अर्पित कर देना।
जब मनुष्य अपने अहंकार को छोड़कर स्वयं को ईश्वर का मान लेता है, तभी वास्तविक शांति का अनुभव करता है। चौथा है कार्पण्य, जिसका अर्थ है विनम्रता।
साधक को यह स्वीकार करना चाहिए कि वह अपनी शक्ति से कुछ भी नहीं कर सकता और ईश्वर की कृपा ही उसकी सबसे बड़ी संपत्ति है। यही भावना उसे अहंकार से बचाती है।
पाँचवाँ अंग है गोप्तृत्व वरण’ इसका अर्थ है भगवान को अपना एकमात्र रक्षक और पालक मानना। जब व्यक्ति हर परिस्थिति में ईश्वर पर भरोसा रखता है, तब भय और चिंता स्वतः समाप्त होने लगते हैं।
छठा अंग है रक्षति विश्वासः का अर्थ है यह अटूट विश्वास रखना कि ईश्वर हमारी रक्षा अवश्य करेंगे। जब मनुष्य सच्चे मन से ईश्वर पर भरोसा करता है, धर्म और सदाचार का पालन करता है तथा कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य नहीं खोता, तब उसे मानसिक शक्ति, साहस और आत्मविश्वास मिलता है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि ईश्वर-प्राप्ति किसी विशेष वर्ग के लोगों तक सीमित नहीं है*। प्रत्येक व्यक्ति यदि सच्चे विश्वास, विनम्रता, समर्पण और शरणागति के साथ जीवन व्यतीत करे, तो वह आध्यात्मिक आनंद का अनुभव कर सकता है।
रामकृष्ण की शिक्षाएँ आज भी हमें यही प्रेरणा देती हैं कि ईश्वर हमारे अत्यंत निकट हैं; आवश्यकता केवल उन्हें सच्चे मन से स्वीकार करने और उनकी शरण में जाने की है। यही विश्वास और समर्पण मनुष्य के जीवन को सफल, शांत और आनंदमय बनाते हैं।



