योग तंत्र में सुषुम्ना नाड़ी का विशेष महत्व- मुक्तिनाथानन्द
शांत मन आध्यात्मिक विकास का आधार

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। शांत मन की आध्यात्मिक विकास विशेषताओं को बताया गया।
बुधवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मन, प्राण और चेतना के संबंध को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
मन की चंचलता को शांत करके मनुष्य अपने भीतर छिपी आध्यात्मिक शक्ति और चेतना का अनुभव कर सकता है। रामकृष्ण परमहंस के जीवन में दिखाई देने वाली भावावस्था इसी गहन आध्यात्मिक अनुभव का एक प्रेरणादायक उदाहरण मानी जाती है।
‘भाव’ की अवस्था में साधक का मन सामान्य सांसारिक विचारों से ऊपर उठकर ईश्वर तथा आध्यात्मिक चेतना की ओर केंद्रित हो जाता है। स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण परमहंस ने अपनी भावावस्थाओं के संदर्भ में डॉ. महेंद्रलाल सरकार से भी चर्चा की थी।
सामान्य दृष्टि से ऐसी अवस्था को तंत्रिका-तंत्र की गतिविधि में परिवर्तन के रूप में समझा जा सकता है। जबकि आध्यात्मिक दृष्टि इसे उच्चतर चेतना की अवस्था मानती है। भारतीय दर्शन में चेतना की चार अवस्थाओं का उल्लेख मिलता है। जिसमें जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय है ।
पहली तीन अवस्थाएँ हमारे सामान्य अनुभव से जुड़ी हैं, जबकि तुरीय को उससे परे की, अत्यंत सूक्ष्म और आध्यात्मिक चेतना की अवस्था माना गया है। स्वामी ने कहा कि योग और तंत्र परंपरा में सुषुम्ना नाड़ी का विशेष महत्व है।
परंपरागत मान्यता के अनुसार शरीर में तीन प्रमुख नाड़ियाँ इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना होती हैं। इड़ा और पिंगला को क्रमशः शरीर और मन की विभिन्न ऊर्जात्मक प्रवृत्तियों से जोड़ा जाता है। जबकि सुषुम्ना को मध्य मार्ग माना गया है। कुण्डलिनी शक्ति की अवधारणा भी इसी आध्यात्मिक परंपरा से संबंधित है।
इसे मूलाधार से सहस्रार तक चेतना के ऊर्ध्वगमन के प्रतीक के रूप में समझा जाता है। मन और श्वास का संबंध भी भारतीय योग-दर्शन में महत्वपूर्ण माना गया है। श्वास की गति और मानसिक स्थिति एक-दूसरे को प्रभावित करती हुई प्रतीत होती हैं।
परंपरा में तीन गुणों रजस, तमस और सत्त्व का वर्णन मिलता है। रजस सक्रियता और इच्छाओं से, तमस जड़ता और निष्क्रियता से तथा सत्त्व शांति, संतुलन और निर्मलता से संबंधित माना जाता है। जब मन अधिक शांत और संतुलित होता है।
तब साधना के लिए अनुकूल वातावरण बनता है। इसी संदर्भ में दोनों नासिकाओं से संतुलित श्वास को सत्त्व की प्रधानता का प्रतीक माना गया है।
आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य केवल बाहरी क्रियाओं को बदलना नहीं, बल्कि मन को धीरे-धीरे शांत, एकाग्र और निर्मल बनाना है। जब विचारों की चंचलता कम होती है, तब व्यक्ति अपने भीतर की चेतना को अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव कर सकता है।
स्वामी ने समझाया कि आध्यात्मिक यात्रा का अंतिम उद्देश्य केवल किसी विशेष अनुभव की प्राप्ति नहीं, बल्कि जीवन में शांति, विवेक, करुणा और आत्म-जागरूकता का विकास है।
सुषुम्ना, कुण्डलिनी और तुरीय जैसी अवधारणाएँ भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में इसी आंतरिक परिवर्तन को समझाने के प्रतीकात्मक एवं योगिक माध्यम हैं।
रामकृष्ण का जीवन यह प्रेरणा देता है कि ईश्वर या परम सत्य की खोज केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न रहकर व्यक्तिगत साधना और अनुभव की दिशा में भी आगे बढ़नी चाहिए।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मन की शांति आध्यात्मिक विकास की आधारभूमि है। संतुलित मन, संयमित जीवन और निरंतर साधना के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की गहराइयों को समझने का प्रयास कर सकता है। यही आंतरिक जागरण जीवन को अधिक अर्थपूर्ण, शांत और आध्यात्मिक बना सकता है।



