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समय रहते प्रकृति के संकेतों को समझना होगा -मुकेश शर्मा 

विश्व पर्यावरण दिवस कल 

 

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। प्रकृति के बदलते स्वरुप पर विषय विशेषज्ञों ने जानकारी साझा की।

गुरुवार को पापुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर मुकेश शर्मा ने कहा कि हर साल तापमान में हो रही बढ़ोत्तरी से भीषण गर्मी की मार झेल रहे लोग, आग की लपटों से झुलसते जंगल, समुद्र का बढ़ता जल स्तर, पिघलते ग्लेशियर साफ़ संकेत दे रहे हैं कि

पर्यावरण संरक्षण के प्रति अब भी न चेते तो बहुत देर हो जाएगी। इन संकेतों को गंभीरता से लेते हुए जल, जंगल व जमीन को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर मुहिम चलाने की जरूरत है।

पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता की अलख जगाने के लिए ही हर साल पांच जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस साल विश्व पर्यावरण दिवस की थीम-“प्रकृति से प्रेरित, जलवायु के लिए ‘हमारे भविष्य के लिए” तय की गयी है।

श्री शर्मा का कहना है कि पेट्रोल-डीजल मोटर गाड़ियों की बढ़ती तादाद और कारखानों से निकलने वाले कचरे भी वायु और पर्यावरण को दूषित कर रहे हैं।

इस समस्या से निजात पाने के लिए इलेक्ट्रानिक वाहनों को बढ़ावा देना होगा और सार्वजनिक वाहनों से यात्रा को प्राथमिकता देनी होगी ताकि कार्बन डाइआक्साइड के बड़ी मात्रा में उत्सर्जन में कमी लाने के साथ ही धूल और धुएं के प्रदूषण में भी कमी आ सके।

धरती की शोभा को बढ़ाने वाले हरे-भरे पेड़ों की जगह कंक्रीट के जंगल ले रहे हैं, बन रहीं ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएं और कारखाने एक ओर जहाँ हमें आधुनिकता का भान करा रहे हैं वहीँ यह सभी पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।

ऑक्सीजन की समस्या से लोग जूझ रहे हैं, बीमारियाँ पाँव पसार रही हैं। कई वन्य जीवों और पौधों की प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। इसके लिए जरूरी है कि वृक्षारोपण को प्राथमिकता देते हुए उसकी देखभाल पर पूरा जोर दिया जाए ताकि लोगों को जरूरत भर की ऑक्सीजन आसानी से मुफ्त मिल सके।

पर्यावरण संरक्षण में युवा वैज्ञानिक, स्कूल-कॉलेज के बच्चे बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यह पीढ़ी सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल प्लेटफार्म के माध्यम से लोगों को पर्यावरण संरक्षण के बारे में जागरूक करने के साथ ही उसके लिए उठाये जाने वाले जरूरी क़दमों के लिए प्रेरित भी कर सकती है।

युवा वर्ग दिनचर्या में उन छोटी-छोटी आदतों को अपना सकता है, जो पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में सहायक बन सकते हैं, जैसे- सिंगल यूज प्लास्टिक से पूरी तरह दूरी बना लेना, सार्वजनिक वाहनों या साइकिल का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करना, वृक्षारोपण और उसकी देखभाल को पसंदीदा शौक बना लेना आदि।

बढ़ता पर्यावरण प्रदूषण देश की अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव डाल रहा है। इसकी वजह से बढ़ती बीमारियों से निपटने के लिए एक बड़ी राशि खर्च करनी पड़ रही है। सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ती आबादी का भी दबाव साफ़ देखा जा सकता है।

शहरीकरण के चलते कृषि योग्य भूमि कम होती जा रही है। उर्वरा शक्ति की कमी के चलते अनाज की पैदावार में भी निरंतर कमी देखी जा रही है।

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