ईश्वर केवल किसी दूरस्थ सत्ता या कल्पना का नाम नहीं- मुक्तिनाथानन्द
ईश्वर को प्राप्त करना जीवन का वास्तविक उद्देश्य

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर प्राप्ति के लिए सत्यता को धारण करना अहम् बताया गया।
रविवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ईश्वर की अनुभूति को मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य माना गया है।
ईश्वर केवल किसी दूरस्थ सत्ता या कल्पना का नाम नहीं, बल्कि वह चेतना है जो संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। मनुष्य के भीतर भी उसी दिव्य सत्ता का निवास है। रामकृष्ण परमहंस का जीवन इसी सत्य की प्रत्यक्ष अनुभूति का महान उदाहरण है।
उनका संदेश था कि ईश्वर को केवल शास्त्रों में पढ़ना या दूसरों के अनुभवों पर विश्वास करना पर्याप्त नहीं है; मनुष्य को स्वयं ईश्वर का अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए। स्वामी ने कहा कि ईश्वर के अनुभव के तीन प्रमुख प्रमाण माने जा सकते हैं।
शास्त्र प्रमाण, अनुभव प्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाण। शास्त्र प्रमाण हमें ईश्वर के स्वरूप और मार्ग का ज्ञान देता है। महापुरुषों के अनुभव प्रमाण से हमें विश्वास मिलता है कि आध्यात्मिक सत्य केवल कल्पना नहीं है।
किंतु प्रत्यक्ष प्रमाण अर्थात स्वयं ईश्वर की अनुभूति सबसे श्रेष्ठ है। जब साधक स्वयं उस दिव्य सत्ता का अनुभव करता है, तब उसके भीतर का संशय समाप्त हो जाता है। रामकृष्ण परमहंस कहते थे कि “जिसका जैसा मन है, वह उसको उसी तरह देखता है।
इस कथन में आध्यात्मिक साधना का अत्यंत गहरा रहस्य छिपा है। हमारा मन जिस प्रकार का होता है, हमारी ईश्वर-दृष्टि भी उसी प्रकार की होती है। यदि मन अशांत, स्वार्थी और इच्छाओं से भरा हुआ है, तो ईश्वर की अनुभूति कठिन हो जाती है।
इसके विपरीत, जब मन शुद्ध, सरल, प्रेमपूर्ण और एकाग्र होता है, तब साधक के लिए दिव्य सत्य का अनुभव संभव हो जाता है। ईश्वर मन और विचारों की सीमाओं से परे हैं, इसलिए उन्हें केवल बौद्धिक तर्क से समझना संभव नहीं; उन्हें साधना और अनुभव के माध्यम से जाना जा सकता है।
स्वामी ने कहा कि रामकृष्ण और नरेंद्रनाथ दत्त, जो आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से प्रसिद्ध हुए, के संबंध में भी प्रत्यक्ष ईश्वरानुभूति का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण था। नरेंद्रनाथ की जिज्ञासा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी।
वे सत्य को स्वयं जानना चाहते थे। रामकृष्ण ने उन्हें यह समझाया कि ईश्वर को प्राप्त करना जीवन का वास्तविक उद्देश्य है और इसके लिए मन को एकाग्र करके साधना करनी चाहिए। आध्यात्मिक संगीत भी इस साधना का प्रभावशाली माध्यम है।
नरेंद्रनाथ द्वारा श्रीरामकृष्ण के समक्ष गाए गए भक्ति-गीतों में ऐसी गहराई और भावनात्मक शक्ति थी कि वे श्रीरामकृष्ण को कई बार गहन समाधि की अवस्था में ले जाते थे।
इससे स्पष्ट होता है कि सच्चा संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मन को बाहरी संसार से हटाकर ईश्वर की ओर ले जाने वाली साधना भी बन सकता है।
स्वामी ने समझाया कि साधना में ‘सत-असत विचार’ अर्थात शाश्वत और नश्वर के बीच विवेक करना भी आवश्यक है। संसार की वस्तुएँ, परिस्थितियाँ और संबंध परिवर्तनशील हैं, जबकि ईश्वर शाश्वत हैं।
इसलिए जीवन में ईश्वर को ध्रुवतारे की तरह अपना मार्गदर्शक बनाना चाहिए। संसार की अस्थिर वस्तुओं पर पूरी तरह निर्भर रहने से मनुष्य निराश और अस्थिर हो सकता है। इसके साथ ही समर्पण और विनम्रता आध्यात्मिक जीवन के आधार हैं।
अहंकार और सांसारिक इच्छाओं को त्यागकर मनुष्य जब स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित करता है, तब उसके भीतर प्रेम और शांति का विकास होता है। ईश्वर कोई कभी-कभार आने वाले अतिथि नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण और प्रत्येक स्थान में उपस्थित शाश्वत सत्ता हैं।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण का संदेश आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। ईश्वर के बारे में केवल सुनना या पढ़ना ही पर्याप्त नहीं; उन्हें अपने जीवन में प्रत्यक्ष अनुभव करने का प्रयास करना चाहिए।
शुद्ध मन, भक्ति, विवेक, संगीत, ध्यान, विनम्रता और समर्पण के माध्यम से मनुष्य उस दिव्य उपस्थिति को अनुभव कर सकता है। यही प्रत्यक्ष अनुभूति मानव जीवन को सार्थक बनाती है और उसे बाहरी संसार की अस्थिरता से उठाकर शाश्वत सत्य से जोड़ देती है।



