सुषुम्ना को मेरुदंड के मध्य से जुड़ा सूक्ष्म मार्ग – मुक्तिनाथानन्द
भीतर विद्यमान दिव्य चेतना को पहचाने

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। शरीर की रीढ़ में विद्यमान सुषुम्ना नाड़ी की विशेषता का वर्णन किया गया।
मंगलवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में मनुष्य के भीतर निहित चेतना और उसकी उच्च अवस्था की प्राप्ति को महत्त्व दिया गया है।
कुण्डलिनी शक्ति, चक्र और सुषुम्ना नाड़ी आध्यात्मिक साधना से जुड़े महत्वपूर्ण विषय हैं। श्रीरामकृष्ण परमहंस के जीवन और वचनों में आध्यात्मिक अनुभूति को केवल विचार या सिद्धांत नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में समझने की प्रेरणा मिलती है।
उनके संदर्भ में कुण्डलिनी जागरण को आत्मिक उन्नति और ईश्वर-साक्षात्कार की दिशा में बढ़ने वाली चेतना की यात्रा के रूप में देखा जा सकता है। स्वामी ने बताया कि कुण्डलिनी शक्ति को योग और तांत्रिक परंपराओं में मनुष्य के भीतर स्थित एक सुप्त आध्यात्मिक शक्ति माना गया है।
परंपरागत वर्णन के अनुसार यह शक्ति मूलाधार चक्र में स्थित रहती है और जागरण के बाद सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से ऊपर की ओर अग्रसर होती है। सुषुम्ना को मेरुदंड के मध्य से जुड़ा सूक्ष्म मार्ग माना गया है।
इस अवधारणा का उद्देश्य केवल शरीर की किसी संरचना का वर्णन करना नहीं, बल्कि चेतना के क्रमिक परिष्कार और आध्यात्मिक गहरी यात्रा को समझाना है। इस परंपरा में सात प्रमुख चक्रों का उल्लेख मिलता है।
मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार या शिखर केंद्र। इन्हें चेतना की विभिन्न अवस्थाओं और साधक की आंतरिक यात्रा के प्रतीक के रूप में समझा जाता है। मूलाधार से ऊपर उठती हुई साधना धीरे-धीरे सांसारिक आसक्ति से मन को हटाकर अधिक सूक्ष्म और व्यापक चेतना की ओर ले जाती है।
अनाहत चक्र को विशेष महत्त्व दिया गया है, क्योंकि इसे हृदय और प्रेम से जोड़ा जाता है। यहाँ साधक का मन बाहरी विषयों से हटकर भीतर की आध्यात्मिक अनुभूति की ओर मुड़ने लगता है।
इसके आगे विशुद्ध और आज्ञा केंद्र की ओर चेतना का आरोहण साधक के भीतर एकाग्रता, विवेक और ईश्वर के प्रति गहन आकर्षण को दर्शाता है। आज्ञा केंद्र को भौहों के मध्य स्थित ध्यान-केंद्र के रूप में वर्णित किया जाता है।
इस अवस्था में साधक का मन सांसारिक विषयों से अधिकाधिक हटकर दिव्य चिंतन में केंद्रित होने लगता है। इस प्रकार कुण्डलिनी का ऊपर उठना केवल किसी ऊर्जा की गति के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर होने वाले परिवर्तन* के रूप में भी समझा जा सकता है।
स्वामी ने कहा कि रामकृष्ण की आध्यात्मिक अनुभूतियों को समझने के लिए वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोणों के बीच अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है। चिकित्सकीय या वैज्ञानिक दृष्टि से समाधि जैसी अवस्थाओं को मस्तिष्क और तंत्रिका-तंत्र की प्रक्रियाओं से समझने का प्रयास किया जा सकता है।
जबकि आध्यात्मिक परंपरा उन्हें चेतना की उच्च अवस्था और ईश्वरानुभूति के रूप में देखती है। दोनों दृष्टिकोणों का अपना संदर्भ है। कुण्डलिनी, नाड़ी और चक्रों को आधुनिक शरीर-विज्ञान की प्रमाणित शारीरिक संरचनाओं के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय आध्यात्मिक परंपरा की भाषा और प्रतीकों के रूप में समझना अधिक उचित है।
रामकृष्ण का संदेश साधक को बाहरी संसार में उलझे रहने के बजाय अपने भीतर की चेतना को शुद्ध और एकाग्र करने की प्रेरणा देता है।
उनके अनुसार ईश्वर की अनुभूति केवल बौद्धिक चर्चा का विषय नहीं है; साधना, भक्ति और आत्मानुशासन के माध्यम से उसे अनुभव करने का प्रयास किया जाना चाहिए। कुण्डलिनी जागरण की परंपरागत अवधारणा भी इसी आंतरिक यात्रा की ओर संकेत करती है।
जहाँ मन धीरे-धीरे सांसारिक चिंताओं से ऊपर उठकर आत्मबोध और ईश्वरबोध की दिशा में बढ़ता है। स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि कुण्डलिनी शक्ति और चक्रों की शिक्षा को केवल रहस्यमय विषय मानने के बजाय आत्मपरिवर्तन की एक आध्यात्मिक रूपक-यात्रा के रूप में देखा जा सकता है।
इसका अंतिम उद्देश्य बाहरी उपलब्धियों से अधिक भीतर की सच्ची शांति, विवेक, प्रेम, गहरी स्थिरता और आत्मिक जागृति है। श्रीरामकृष्ण की साधना-दृष्टि हमें यही प्रेरणा देती है कि मनुष्य अपने पूरे जीवन को उच्च और स्पष्ट आध्यात्मिक लक्ष्य से जोड़कर अंतर्मुखी साधना करे और अपने भीतर निहित दिव्य चेतना को पहचानने का प्रयास करे।



