सच्ची आध्यात्मिकता केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं – मुक्तिनाथानन्द
रामकृष्ण मठ दुर्गाेत्सव का आयोजन

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। शारदीय नवरात्रि पर माँ आदि शक्ति भक्ति की झलक देखने को मिली।
शुक्रवार को रामकृष्ण मठ निराला नगर में प्राचीन परंपरा के अनुसार छः दिवसीय यानि 21 अक्टूबर तक दुर्गा पूजनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। कार्यक्रमों का सीधा प्रसारण मठ के आधिकारिक यूट्यूब चौनल ‘रामकृष्ण मठ, लखनऊ’ के माध्यम से भी किया जा रहा है।
पहले दिन पूजा मुख्य मंदिर में मंगल आरती के साथ की गयी। प्रातः 6ः15 बजे षष्ठ्यादि कल्पारम्भ वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ दुर्गा स्तुति की गई। इसके पश्चात मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने ‘जीवंत दुर्गा माँ सारदा’ विषय पर विशेष ऑनलाइन सत्प्रसंग प्रस्तुत किया।
स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने कहा कि माँ सारदा देवी, भगवान रामकृष्ण की दिव्य सहधर्मिणी एवं जगज्जननी माँ दुर्गा का सजीव स्वरूप थीं। जिस प्रकार माँ दुर्गा अपनी असीम शक्ति, करुणा और वात्सल्य से समस्त संसार का पालन करती हैं।
उसी प्रकार माँ सारदा देवी ने अपने निर्मल प्रेम, असीम क्षमाशीलता और आध्यात्मिक शक्ति से असंख्य भक्तों को आश्रय प्रदान किया। उन्होंने कभी किसी के दोष नहीं देखे, बल्कि सभी को अपनी संतान मानकर अपनाया।
माँ का पावन जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि सच्ची आध्यात्मिकता केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रेम, सेवा, त्याग और दूसरों के प्रति करुणा में भी निहित है।
माँ ने अपने जीवन एवं संदेश से यह सिद्ध किया कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए मन की पवित्रता और समस्त प्राणियों के प्रति प्रेम अत्यंत आवश्यक है।
दुर्गा पूजा के इस पावन अवसर पर हमें माँ सारदा देवी के दिव्य जीवन का स्मरण करते हुए उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें विवेक, भक्ति, पवित्रता एवं निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा प्रदान करें, ताकि हम प्रत्येक प्राणी में ईश्वर का दर्शन कर सकें।
माँ के अमृतमय वचन “यदि शान्ति चाहती हो, माँ, तो किसी का दोष मत देखो; दोष देखना है तो अपना दोष देखो”आज भी हमारे जीवन का मार्गदर्शन करते हैं।
मुक्तिनाथानन्द महाराज ने शारदीय नवरात्रि की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यह वह पावन समय है, जब भक्तगण जगज्जननी माँ दुर्गा की विशेष आराधना करते हैं तथा उनकी दिव्य कृपा प्राप्त करने के लिए प्रार्थना करते हैं।
इस अवसर पर निम्नलिखित संस्कृत श्लोक उद्धृत किया गया-
त्वं परा प्रकृतिः साक्षात् परमब्रह्मः परमात्मनः।
त्वत्तो जातं जगत्सर्वं त्वं जगज्जननी शिवे॥
अर्थात, हे भगवती! आप परमात्मा की परा प्रकृति तथा परम ब्रह्म की दिव्य शक्ति हैं। यह संपूर्ण जगत आपसे ही उत्पन्न हुआ है और आप ही समस्त विश्व की जगज्जननी हैं।
तत्पश्चात प्रातः 7ः30 बजे रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम, वृंदावन के स्वामी प्रतिभानन्द महाराज ने दुर्गा मंडप में पूजा एवं चंडीपाठ किया। इसके बाद रामकृष्ण मिशन आश्रम, नरेंद्रपुर के स्वामी शिवधीशानन्द ने भक्तिगीत प्रस्तुत किए।
जिनमें शुभम राज ने तबले पर संगत की। मुक्तिनाथानन्द महाराज ने षष्ठी तिथि के महत्व को स्पष्ट करते हुए बताया कि यह दुर्गा पूजा का एक महत्वपूर्ण दिन है।
जब मुख्य पूजा के विधिवत शुभारंभ के लिए विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इन अनुष्ठानों में कल्पारम्भ, बोधन, अधिवास एवं आमंत्रण प्रमुख हैं।
कल्पारम्भ प्रातःकाल संपन्न होने वाला अनुष्ठान है। जिसमें पूजा को विधिपूर्वक संपन्न करने का संकल्प लिया जाता है। इसमें दुर्गा मंडप के एक निर्धारित स्थान पर जल से भरे तांबे के पात्र अर्थात् घट की स्थापना तथा देवी दुर्गा एवं चंडी की पूजा की जाती है।
सायंकाल रामकृष्ण मिशन आश्रम, नरेंद्रपुर के स्वामी शिवधीशानन्द ने भक्तिगीतों की प्रस्तुति दी। इसके पश्चात सायंकाल देवी दुर्गा के बोधन का अनुष्ठान संपन्न हुआ।
इस अवसर पर विशाल दुर्गा मंडप की भव्य सजावट विशेष आकर्षण का केंद्र रही। माँ की प्रतिमा एवं संपूर्ण मंडप को फूलों तथा अन्य सजावटी सामग्रियों से अत्यंत सुंदर ढंग से सजाया गया है। इस मनोहारी सजावट से पूरे परिसर में भक्तिमय एवं आध्यात्मिक वातावरण व्याप्त हो गया है।



