मानव जीवन का उद्देश्य केवल सांसारिक सुख की प्राप्ति नहीं- मुक्तिनाथानन्द
ज्ञान सुनने से मुक्ति नहीं अपनाने से मिलती

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ज्ञान सुनने से मुक्ति नहीं बल्कि अपनाने से मिलती है।
शुक्रवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मानव जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य केवल सांसारिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और ईश्वर की प्राप्ति है।
मनुष्य जिस प्रकार शारीरिक रोगों से पीड़ित होता है, उसी प्रकार वह मोह, लोभ, अहंकार, क्रोध और विषय-वासनाओं से उत्पन्न ‘भव रोग’ अर्थात संसार रूपी व्याधि से भी ग्रस्त रहता है।
इस रोग से मुक्ति केवल ज्ञान सुन लेने से नहीं, बल्कि उसे जीवन में अपनाने से मिलती है। इस विषय को तीन प्रमुख आधारों सत्संग, उपदेशों का पालन तथा पथ्य और शरणागति के माध्यम से स्पष्ट किया है।
स्वामी ने सबसे पहले सत्संग के महत्व पर प्रकाश डाला गया है। केवल किसी सत्संग में बैठ जाना या आध्यात्मिक प्रवचन सुन लेना पर्याप्त नहीं है।
जैसे किसी रोगी के लिए केवल डॉक्टर से मिलना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उसके संपर्क में रहकर उचित सलाह लेना और नियमित उपचार करना भी आवश्यक होता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति के लिए संतों और महापुरुषों की संगति तथा उनके विचारों का निरंतर श्रवण आवश्यक है।
सत्संग मनुष्य के भीतर शुभ संस्कारों का विकास करता है, मन को शुद्ध करता है और जीवन की सही दिशा दिखाता है।
यह हमें संसार के क्षणिक आकर्षणों से हटाकर ईश्वर की ओर अग्रसर करता है। स्वामी ने बताया कि दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है उपदेशों का पालन।
रामकृष्ण परमहंस स्पष्ट कहते हैं कि केवल सुनकर भूल जाना व्यर्थ है। यदि किसी रोगी को डॉक्टर दवा दे और वह उसे न ले, तो रोग कभी दूर नहीं होगा। इसी प्रकार संत-महात्माओं के उपदेश तभी फलदायी होते हैं, जब उन्हें श्रद्धा और विश्वास के साथ व्यवहार में उतारा जाए।
सत्य बोलना, संयम रखना, ईश्वर का स्मरण करना, दूसरों के प्रति करुणा रखना और अपने आचरण को शुद्ध बनाना ये सभी आध्यात्मिक जीवन की आवश्यक औषधियाँ हैं। ज्ञान तभी सार्थक होता है जब वह हमारे व्यवहार, विचार और चरित्र में दिखाई दे।
स्वामी ने आगे कहा कि तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण उपाय पथ्य (परहेज) तथा शरणागति है। जिस प्रकार शारीरिक रोग में दवा के साथ उचित परहेज भी आवश्यक होता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन में भी कुछ नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
पथ्य का अर्थ है सत् और असत् का विवेक करना, ईश्वर के नाम का निरंतर स्मरण करना, प्रार्थना करना तथा मन को विषय-विकारों से दूर रखना।
जब मनुष्य इन साधनों का नियमित अभ्यास करता है, तब उसका मन धीरे-धीरे निर्मल होता जाता है। अंततः उसे पूर्ण शरणागति का भाव अपनाना चाहिए, अर्थात अपने अहंकार और स्वार्थ का त्याग करके स्वयं को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए।
यही समर्पण मनुष्य को भय, चिंता और मोह से मुक्त करता है तथा उसे सच्ची शांति प्रदान करता है। स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भव रोग से मुक्ति का मार्ग कठिन नहीं, बल्कि नियमित अभ्यास और दृढ़ श्रद्धा का मार्ग है।
सत्संग से सही ज्ञान मिलता है, उपदेशों के पालन से जीवन में परिवर्तन आता है और पथ्य तथा पूर्ण शरणागति से आत्मा ईश्वर के निकट पहुँचती है।
इसलिए केवल आध्यात्मिक बातें सुनना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें दैनिक जीवन का अंग बनाना आवश्यक है। यही अभ्यास मनुष्य के जीवन को सार्थक, शांत, आनंदमय और ईश्वरमय बनाता है।



