उत्तर प्रदेशधर्म-अध्यात्मबड़ी खबर

मनुष्य के जीवन में काम, क्रोध, लोभ और मोह प्रवृत्तियाँ नकारात्मक -मुक्तिनाथानन्द 

इन्हें दबाने की नहीं, बल्कि उनकी दिशा बदलने की जरुरत 

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। इंसान के जीवन में नकारात्मक प्रभाव डालने वाली प्रवृत्तियाँ गिनाई गयी।

रविवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मनुष्य के जीवन में काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी प्रवृत्तियाँ सदैव उपस्थित रहती हैं।

सामान्यतः इन्हें नकारात्मक गुण माना जाता है और लोग इनसे छुटकारा पाने का प्रयास करते हैं। स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने श्रीरामकृष्ण कथामृत के एक प्रसंग के माध्यम से यह समझाते हैं कि

इन प्रवृत्तियों को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है। आवश्यकता इन्हें दबाने की नहीं, बल्कि उनकी दिशा बदलने की है।

स्वामी बताते हैं कि काम, क्रोध और लोभ हमारे मन के सहज उपादान हैं। जब तक शरीर और मन का अस्तित्व है, तब तक इन प्रवृत्तियों का होना स्वाभाविक है।

इसलिए इन्हें जड़ से मिटाने का प्रयास कई बार निराशा और संघर्ष को जन्म देता है। आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक मार्ग इन शक्तियों को सकारात्मक दिशा प्रदान करना है।

श्रीरामकृष्ण परमहंस ने अपने भक्त गिरींद्र घोष के माध्यम से एक महत्वपूर्ण शिक्षा दी थी। उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य इन प्रवृत्तियों को दबाने में असमर्थ है, तो उन्हें नष्ट करने का प्रयास करने के बजाय उनकी दिशा बदल दे। जैसे नदी का जल यदि अनियंत्रित हो तो विनाश का कारण बनता है।

किंतु उसी जल को उचित दिशा देकर खेतों की सिंचाई और जनकल्याण का साधन बनाया जा सकता है। उसी प्रकार मन की शक्तियों को भी ईश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है।

इस विचार को स्पष्ट करने के लिए स्वामी एक सुंदर उदाहरण देते हैं। जिस प्रकार बाढ़ के पानी पर बाँध बनाकर उससे बिजली उत्पन्न की जाती है, उसी प्रकार काम और क्रोध जैसी प्रबल मानसिक शक्तियों को भगवान के प्रति प्रेम, भक्ति और ईश्वर-प्राप्ति की

तीव्र आकांक्षा में परिवर्तित किया जा सकता है। जब मनुष्य अपनी इच्छाओं और भावनाओं को सांसारिक विषयों से हटाकर आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर केंद्रित करता है, तब वही ऊर्जा उसके आत्मिक विकास का साधन बन जाती है।

क्रोध के विषय में भी स्वामी जी एक अनूठी दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि यदि हम भगवान का नाम लेने और साधना करने के बाद भी ईश्वर का अनुभव नहीं कर पा रहे हैं, तो हमारे भीतर एक प्रकार का असंतोष या ‘क्रोध’ उत्पन्न होना चाहिए।

यह क्रोध किसी व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि अपनी आध्यात्मिक शिथिलता के प्रति होना चाहिए। ऐसा असंतोष हमें अधिक लगन, अधिक भक्ति और अधिक समर्पण के साथ ईश्वर की खोज करने के लिए प्रेरित करता है।

निष्कर्ष रूप में स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि यह शिक्षा हमें बताती है कि मनुष्य के भीतर उपस्थित शक्तियाँ न तो अच्छी होती हैं और न बुरी; उनका स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि हम उनका उपयोग किस दिशा में करते हैं।

यदि काम और क्रोध संसार की ओर ले जाते हैं तो वे बंधन बनते हैं, लेकिन यदि वही शक्तियाँ ईश्वर-प्रेम और आत्मिक उन्नति की ओर प्रवाहित हों, तो वे मुक्ति का मार्ग बन जाती हैं। यही जीवन की सच्ची साधना है। नकारात्मक प्रवृत्तियों का दमन नहीं, बल्कि उनका दिव्य रूपांतरण।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button