मानवता के कल्याण को ईश्वर का पृथ्वी पर अवतरण अकेले नहीं -मुक्तिनाथानन्द
भगवान और उनके भक्तों का संबंध जन्म-जन्मांतर से भी परे

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। मानव कल्याण के लिए ईश्वर का धरती पर अवतरण में साथ कई दिव्य आत्माओं का प्रकट होना बताया गया। रविवार को
प्रातः कालीन सत् में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में भगवान के अवतार का विचार अत्यंत गहन और रहस्यमय है।
जब धर्म की स्थापना और मानवता के कल्याण के लिए ईश्वर पृथ्वी पर अवतरित होते हैं, तब वे अकेले नहीं आते। उनके साथ कुछ ऐसी दिव्य आत्माएं भी आती हैं, जो उनके शाश्वत सहचर होती हैं।
रामकृष्णदेव ने ऐसी आत्माओं को ईश्वरकोटि कहा। ये वे महान आत्माएँ हैं जो साधारण जीवों की तरह संसार के बंधनों में बँधी हुई नहीं होतीं, बल्कि ईश्वर के दिव्य कार्य में सहयोग करने के लिए अवतरित होती हैं।
स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण देव ने अपने जीवन में कुछ शिष्यों को ईश्वरकोटि के रूप में पहचाना। इनमें पूर्णचंद्र घोष, अर्थात् पूर्ण, का स्थान विशेष है।
एक बार श्रीरामकृष्ण देव ने अपने एक दिव्य अनुभव का वर्णन करते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं को एक बालक के रूप में देखा, जो शिहोरे के खेतों में पूर्ण के साथ खेल रहा था। यह अनुभव केवल किसी साधारण मित्रता का संकेत नहीं था, बल्कि भगवान और उनके शाश्वत सहचर के बीच के दिव्य संबंध का प्रतीक था।
पूर्ण का जीवन इस बात का अद्भुत उदाहरण है कि आध्यात्मिक महानता केवल संन्यासियों तक सीमित नहीं है। श्रीरामकृष्ण के छह ईश्वरकोटि शिष्यों में अधिकांश संन्यासी बने, लेकिन पूर्ण गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी असाधारण आध्यात्मिक ऊँचाई पर स्थित थे।
उन्होंने बहुत छोटी आयु में ही श्रीरामकृष्ण देव की दिव्यता को पहचान लिया था। सामान्य दृष्टि से देखें तो किसी व्यक्ति को गुरु के रूप में स्वीकार करना एक बात है, लेकिन किसी महापुरुष में स्वयं ईश्वर का दर्शन कर लेना बिल्कुल दूसरी बात।
पूर्ण के भीतर यह पहचान स्वाभाविक रूप से विद्यमान थी। स्वामी ने समझाया कि भगवान और भक्त का संबंध केवल पूजा और प्रार्थना तक सीमित नहीं होता। उसमें प्रेम, विश्वास, निकटता और एक अद्भुत दिव्य खेल,लीला भी होती है।
ईश्वर अपने भक्तों के साथ कभी गुरु बनकर, कभी मित्र बनकर और कभी स्नेहमयी माता-पिता के रूप में संबंध स्थापित करते हैं। भक्त भी इस लीला में भाग लेता है, यद्यपि कई बार उसे उस संबंध की पूर्ण दिव्यता का तत्काल बोध नहीं होता।
जैसे कोई खेल समाप्त होने पर ही उसके वास्तविक अर्थ को समझता है, वैसे ही जीवन की घटनाओं के पीछे छिपी ईश्वरीय योजना भी समय के साथ स्पष्ट होती है। पूर्ण के जीवन से यह भी स्पष्ट होता है कि ईश्वरकोटि आत्मा भगवान से निरंतर जुड़ी रहती है।
कठिन परिस्थितियों और शारीरिक कष्ट के समय भी पूर्ण ने श्रीरामकृष्ण की दिव्य उपस्थिति का अनुभव किया। यह अनुभव बताता है कि भगवान की उपस्थिति केवल मंदिर, पूजा या ध्यान तक सीमित नहीं है।
जिस हृदय में सच्ची श्रद्धा और पहचान जागृत हो जाती है, उसके लिए ईश्वर जीवन के प्रत्येक क्षण में साथ रहते हैं।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि ईश्वरकोटि की अवधारणा हमें यह संदेश देती है कि भगवान और उनके भक्तों का संबंध जन्म-जन्मांतर से भी परे है।
वे आत्माएँ संसार में किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं आतीं, बल्कि ईश्वरीय कार्य में सहयोग करने के लिए आती हैं। पूर्ण का जीवन इस दिव्य सत्य का सुंदर उदाहरण है कि गृहस्थ जीवन जीते हुए भी मनुष्य ईश्वर के अत्यंत निकट रह सकता है।
भगवान जब मानवता के कल्याण के लिए अवतरित होते हैं, तो उनकी लीला में सहयोग करने वाली दिव्य शक्तियाँ भी उनके साथ आती हैं।
रामकृष्णदेव और पूर्ण का संबंध इसी शाश्वत दिव्य संगति का प्रतीक है—एक ऐसा संबंध, जिसमें भगवान और भक्त के बीच दूरी समाप्त हो जाती है और जीवन स्वयं ईश्वर की लीला बन जाता है।



