वासनाओं का स्मरण भी मन को करता विचलित- मुक्तिनाथानन्द
संन्यासी के लिए कामिनी त्याग जरूरी

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। सन्यासियों को कठोर त्याग के बारे में बताया गया। बुधवार को
प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण के अनुसार आचार्य चार प्रकार के होते हैं।
अधम, मध्यम, उत्तम और सर्वोत्तम (महाचार्य)। सर्वोत्तम आचार्य केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि शिष्य के संपूर्ण आध्यात्मिक जीवन का उत्तरदायित्व लेकर उसे ज्ञान और ईश्वर की प्राप्ति तक पहुँचाते हैं।
रामकृष्ण स्वयं ऐसे महाचार्य हुए जिन्होंने संन्यासियों, गृहस्थों और सभी वर्गों के लोगों के लिए आदर्श जीवन प्रस्तुत किया।
उन्होंने सिखाया कि गृहस्थ प्रेम, संयम और कर्तव्य के साथ जीवन जिएँ, जबकि संन्यासियों के लिए कामिनी-कांचन का पूर्ण त्याग आवश्यक है। इस प्रकार उनका जीवन समस्त मानवता के लिए सर्वोच्च मार्गदर्शन और प्रेरणा का स्रोत है।
स्वामी ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस ने कामिनी-कांचन त्याग का आदर्श केवल उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि अपने जीवन में पूर्णतः आचरण करके दिखाया।
वे कहते थे कि जैसे इमली के अचार का केवल स्मरण करने से ही मुँह में पानी आ जाता है, वैसे ही विषय-वासनाओं का स्मरण भी मन को विचलित कर देता है। इसलिए संन्यासी को विषयों से दूर रहना चाहिए।
रामकृष्ण का वैराग्य इतना गहरा था कि वे धातु (सिक्के) का स्पर्श भी सहन नहीं कर पाते थे। उनका जीवन पूर्ण त्याग, इन्द्रिय-निग्रह और ईश्वर-निष्ठा का अद्वितीय आदर्श है, जिसकी प्रशंसा स्वामी विवेकानन्द ने भी की है।
स्वामी ने कहा कि कि संसार के प्रति पूर्ण विरक्ति आज के युग में असंभव सी लगती है। घर-परिवार, मान-सम्मान और सुख-सुविधाओं को छोड़ना बहुत कठिन है। पर यही हमारी परंपरा का मूल है।
विशेषकर संन्यासी जीवन का आदर्श ही त्याग है। संन्यासी का अर्थ ही है जिसने सब कुछ ईश्वर के लिए छोड़ दिया हो। इसे समझाने के लिए वे चैतन्य महाप्रभु का उदाहरण देते हैं।
चैतन्य ने भी संन्यास लेकर संसार के मोह को त्यागा और नाम-संकीर्तन के द्वारा भक्ति का मार्ग दिखाया। वे स्वयं संन्यासी का “तुच्छ आदर्श” जीकर गए। “तुच्छ” यहाँ छोटा नहीं, बल्कि अहंकार-रहित, सरल और सबसे नीचे होकर सेवा करने का भाव है।
स्वामी ने चैतन्य के एक परम अनुयायी छोटा हरिदास का भी उल्लेख करते हुए कहा कि हरिदास बहुत योग्य और प्रिय थे, पर किसी कारणवश उनसे भूल हो गई थी। स्वामी ने कहा कि संन्यासी के लिए नियम और संयम कितने कठोर हैं।
जरा सी चूक भी आदर्श से गिरा देती है। संदेश है कि हमारी परंपरा त्याग पर खड़ी है। सच्चा साधक वही है जो संसार की आसक्ति छोड़कर, चैतन्य देव जैसे महापुरुषों के आदर्श पर चलकर, पूर्ण समर्पण और अनुशासन के साथ ईश्वर की ओर बढ़े।
रामकृष्ण परमहंस ने संन्यास जीवन की उच्च मर्यादा और कठोर अनुशासन पर बल दिया है। स्वामी कहते हैं कि रामकृष्ण परमहंस “ठाकुर” ने भी संन्यास के लिए बहुत ऊँचे आदर्श रखे थे।
संन्यासी का जीवन संकल्पपूर्ण, मर्यादित और त्यागमय होना चाहिए। शास्त्र का वचन है। “अमृत यानी मुक्ति केवल त्याग से ही मिलती है।
इसलिए त्याग का आदर्श है “कामिनी-कांचन का वर्जन”। संन्यासी को स्त्री और धन के मोह से दूर रहना चाहिए। तभी वह उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।
त्याग ही आध्यात्मिक जीवन की नींव है। स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि भारतीय परंपरा त्याग पर आधारित है। रामकृष्ण परमहंस महाचार्य थे जिन्होंने संन्यासियों के लिए कामिनी-कांचन के पूर्ण त्याग का आदर्श प्रस्तुत किया।
उन्होंने अपने जीवन से दिखाया कि इन्द्रिय-निग्रह और ईश्वर-निष्ठा के बिना मुक्ति संभव नहीं। आज संसार त्याग कठिन है, पर यही संन्यास का मूल है।
चैतन्य और छोटा हरिदास के उदाहरण से स्पष्ट है कि संन्यासी के लिए अनुशासन अत्यंत कठोर है। अतः सच्चा साधक वही है जो मोह छोड़कर समर्पण और संयम से ईश्वर की ओर बढ़े।



