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एसजीपीजीआई निदेशक ने बांटी दवा तो बच्चों ने बाँधी राखी 

SMA के लिए RNA स्प्लिसिंग मॉडिफायर थेरेपी की शुरुआत

 

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी की बीमारी के लिए खुले थेरेपी के द्वार

SMA से पीड़ित 15 बच्चों को इस दवा का पहला बैच मुफ्त में दिया

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी में स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के लिए उपचार के द्वार खुल गए।

गुरुवार को नेशनल पॉलिसी ऑफ़ रेयर डिज़ीज़ (NPRD) के तहत एसजीपीजीआई में पहली “मेक इन इंडिया” जीन मैनिपुलेशन (SMA के लिए RNA स्प्लिसिंग मॉडिफायर) थेरेपी की शुरुआत की गयी। डॉक्टरों का कहना है कि

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी एक जेनेटिक बीमारी है, जो रीढ़ की हड्डी में मोटर न्यूरॉन सेल्स को खत्म कर देती है। जिससे धीरे-धीरे मांसपेशियां कमज़ोर होने लगती हैं और सूखने लगती हैं।

इन बच्चों में हाइपोटोनिया (शरीर के अंगों का ढीलापन) और मोटर डेवलपमेंट में देरी देखी जाती है। धीरे-धीरे उनमें स्कोलियोसिस (रीढ़ की हड्डी का टेढ़ा होना) और सांस लेने व बोलने की क्षमता में दिक्कतें आने लगती हैं।

ये बच्चे पूरी तरह से सतर्क और बुद्धिमान होते हैं। उनमें से ज़्यादातर बच्चों में सोचने-समझने की बेहतरीन क्षमता होती है। दुनिया भर में औसतन हर 10,000 जीवित जन्मों में से एक बच्चे को यह बीमारी होती है।

जिससे यह दुनिया भर में सबसे आम ऑटोसोमल रिसेसिव बीमारी (जिसमें कैरियर माता-पिता में लक्षण नहीं दिखते और उनके 25 प्रतिशत बच्चे इस बीमारी से प्रभावित होते हैं) बन जाती है और भारत में (बीटा-थैलेसीमिया के बाद) दूसरी सबसे आम बीमारी है।

आबादी में कैरियर की संख्या लगभग 2 प्रतिशत है। जिससे बीमारी का बोझ बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है। आजकल थैलेसीमिया की तरह ही स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के लिए भी सभी गर्भवती महिलाओं की शुरुआती गर्भावस्था में स्क्रीनिंग की जाती है।

आम तौर पर यह माना जाता है कि जेनेटिक बीमारियों का इलाज नहीं हो सकता। हालाँकि, SMA के मामले में कई तरह के इलाज के विकल्प मौजूद हैं।

जैसे वायरस-आधारित जीन थेरेपी, जेनेटिक मॉडिफायर के इंट्राथेकल इंजेक्शन और ओरल RNA स्प्लिसिंग मॉडिफायर; ये सभी दवाएँ विदेशों में बनती हैं. जिससे ये बहुत महंगी और सामर्थ्य से बाहर हो जाती हैं।

नेशनल पॉलिसी ऑफ़ रेयर डिज़ीज़’ स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की एक पहल है। जिसका मकसद दुर्लभ बीमारियों का इलाज करना है।

इसमें कई पक्ष शामिल हैं और सरकार पर अलग-अलग तरफ से भारी दबाव रहता है कि वह विदेशी कंपनियों द्वारा बनाई गई बेहद महंगी दवाओं से दुर्लभ आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारियों का इलाज करे।

‘डुचेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी’ (DMD) और ‘म्यूकोपोलीसैकराइडोसिस’ (MPS) जैसी बीमारियों की दवाएं बहुत महंगी हैं और मरीजों के जीवित रहने पर इनका असर न के बराबर होता है। वहीं दूसरी ओर, ‘स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी’ (SMA) के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं बहुत असरदार हैं।

जीन थेरेपी से SMA के इलाज का खर्च 18 करोड़ रुपये था इसमें कुछ मामलों में दोबारा डोज़ की ज़रूरत पड़ती है। जबकि इंट्राथेकल इंजेक्शन का खर्च हर साल 6 करोड़ रुपये था।

एक विदेशी कंपनी द्वारा बनाई गई ओरल RNA स्प्लिसिंग मॉडिफायर (एक छोटा मॉलिक्यूल) दवा का खर्च 20 किलो वज़न वाले बच्चे के लिए औसतन हर साल एक से दो करोड़ रुपये आता था।

वहीं, भारत में बनने पर इसका खर्च हर साल 3.5 लाख रुपये तक है यानी विदेशी ब्रांड की तुलना में लगभग 50 गुना कम है । संस्थान ने नेशनल रेयर डिजीज पॉलिसी के तहत नैटको फार्मा की ओरल RNA स्प्लिसिंग मॉडिफायर दवा (रिस्डिप्लम) – जिसे NATSMART ब्रांड नाम से जाना जाता है उसे हासिल किया है ।

यह संस्थान के ‘डिपार्टमेंट ऑफ मेडिकल जेनेटिक्स’ में SMA से पीड़ित 15 बच्चों को इस दवा का पहला बैच मुफ्त में दिया गया। अभी 100 से ज़्यादा बच्चे रजिस्टर्ड हैं और 50 से ज़्यादा बच्चे दवा मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं।

वहीं संस्थान के निदेशक पद्मश्री प्रो राधा कृष्ण धीमन ने इस उपलब्धि के लिए ‘मेडिकल जेनेटिक्स विभाग’ को बधाई दी। डॉ. धीमन ने लोगों को संबोधित किया और बहुत ही भावुक और हौसला बढ़ाने वाला भाषण दिया।

उन्होंने दवा बांटी और बच्चों ने उनकी कलाई पर राखी बांधी। साथ ही मिठाइयों का आदान-प्रदान भी हुआ।

इस मौके पर मुख्य चिकित्सा अधीक्षक. प्रो. देवेंद्र गुप्ता, संयुक्त निदेशक (सामग्री प्रबंधन) प्रकाश सिंह और परचेज़ ऑफिसर गंगा विष्णु भी मौजूद थे। मुश्किल हालात के बावजूद दवा हासिल करने में JDMM ऑफिस का खास योगदान रहा।

मेडिकल जेनेटिक्स टीम की अगुवाई विभागाध्यक्ष “डॉ. कौशिक मंडल” कर रहे हैं। जिन्होंने भारत में बनी दवा हासिल करने के लिए तमाम मुश्किलों का सामना किया।

टीम के अन्य फैकल्टी सदस्यों में डॉ. दीप्ति सक्सेना, डॉ. अमिता एम, डॉ. हसीना ए सैत, डॉ. अंशिका श्रीवास्तव, डॉ. प्रज्ञा काफ्ले, डॉ. पूजा मोटवानी, डॉ. आदर्श शामिल हैं।

इसके अलावा अंजू लता गुप्ता के साथ 6 रेजिडेंट डॉक्टरों और वार्ड स्टाफ की एक टीम भी है। डॉ. प्रज्ञा काफ्ले, डॉ. पूजा मोटवानी का बहुत खास योगदान रहा है, साथ ही डॉ. हसीना और डॉ. आदर्श का भी।

यह घटना जेनेटिक बीमारियों के इलाज के इतिहास में एक बड़ी कामयाबी है। संस्थान ने दुनिया को दिखाया है कि भारत उन बीमारियों के खिलाफ अपनी लड़ाई खुद लड़ सकता है, जिनका इलाज नामुमकिन माना जाता था।

संस्थान का मेडिकल जेनेटिक्स विभाग देश में अपनी तरह का पहला विभाग है और अब यह कई तरह की जेनेटिक बीमारियों का इलाज कर रहा है।

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