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स्वामी ने भारत की आध्यात्मिक विरासत को विश्व के सामने किया प्रस्तुत – मुक्तिनाथानन्द 

रामकृष्ण मठ में हिंदू धर्म” विषय पर कार्यक्रम

 

लखनऊ,भारत प्रकाश न्यूज़। राजधानी में स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण की वर्षगांठ मनाई गयी ।

शुक्रवार को रामकृष्ण मठ में शिकागो स्थित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिए गए ऐतिहासिक भाषण की 133वीं वर्षगांठ पर हिंदू धर्म” विषय पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम का सीधा प्रसारण रामकृष्ण मठ लखनऊ के आधिकारिक यूट्यूब चैनल के माध्यम से भी किया गया। वहीं रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने कहा कि रामकृष्ण मिशन के संस्थापक स्वामी विवेकानन्द ने वर्ष 1893 में शिकागो की विश्व धर्म संसद में अपना

ऐतिहासिक भाषण देकर भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। उनके संबोधन ने विश्व में भारत के प्रति दृष्टिकोण को व्यापक रूप से प्रभावित किया और भारतीय वेदान्त तथा योग के सार्वभौमिक दर्शन को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित किया।

स्वामी विवेकानन्द के विचार आज भी हमें आत्मविश्वास, मानव-सेवा और कभी हार न मानने की प्रेरणा देते हैं।

कार्यक्रम का शुभारम्भ विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। तत्पश्चात मठ के संन्यासियों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार किया गया।

स्वामी विवेकानन्द द्वारा 11 सितंबर 1893 को शिकागो धर्म संसद में दिए गए ऐतिहासिक भाषण का अंग्रेजी पाठ विवेकानन्द युवा संघ के विकास पटेल द्वारा प्रस्तुत किया गया। इसके पश्चात भाषण के हिंदी अनुवाद का सस्वर पाठ विवेकानन्द युवा संघ समर नाथ निगम द्वारा किया गया।

इस अवसर पर रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम की प्रबंधकारिणी समिति के अध्यक्ष अमोद गुजराल ने स्वागत भाषण दिया। उन्होंने मंचासीन अतिथियों, विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों, भक्तों एवं युवाओं का स्वागत करते हुए कहा कि शिकागो

धर्म संसद में स्वामी विवेकानन्द द्वारा दिए गए सार्वभौमिक संदेश का प्रचार-प्रसार आज के समय में अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि स्वामी विवेकानन्द ने किसी एक मत अथवा संप्रदाय की व्याख्या करने के बजाय मानव धर्म, मानवता और उसके कर्तव्यों को सामने रखते हुए भारतीय संस्कृति की महान परंपरा से पूरे विश्व को परिचित कराया।

इस अवसर पर स्वामी मुक्तिनाथानन्द महाराज ने विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों को पौधे एवं स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक भेंट कर सम्मानित किया।

कार्यक्रम में विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने धर्म की शिक्षाओं एवं मानवता के प्रति उनके संदेश को प्रस्तुत किया।

विभिन्न धर्म गुरुओं ने रखे विचार..

बौद्ध धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध अनुसंधान संस्थान, संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार के उपाध्यक्ष भिक्षु देवेन्द्र थेरो ने कहा कि भगवान बुद्ध का संदेश करुणा, मैत्री और अहिंसा पर आधारित है।

उन्होंने कहा कि मानवता की वर्तमान चुनौतियों का समाधान आपसी प्रेम, सहिष्णुता और आत्मसंयम में निहित है। सभी धर्मों का मूल उद्देश्य मनुष्य को शांति और सद्भाव के मार्ग पर ले जाना है।

लखनऊ क्रिश्चियन कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. नवीन सैमुअल सिंह ने ईसाई धर्म पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ईसा मसीह का जीवन प्रेम, सेवा और क्षमा का महान संदेश देता है।

सच्चा धर्म वही है जो मनुष्य को दूसरों की सेवा तथा पीड़ितों के प्रति करुणा के लिए प्रेरित करे। समाज में शांति और भाईचारे की स्थापना के लिए प्रेम ही सबसे प्रभावी मार्ग है।

ऑल इंडिया शिया हुसैनी काउंसिल, लखनऊ के उपाध्यक्ष एवं शिया धर्मगुरु मौलाना अब्बास नासिर सईद अबाकाती ने इस्लाम के संदेश पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस्लाम शांति, भाईचारे, न्याय और मानव-सेवा का संदेश देता है।

उन्होंने कहा कि सभी मनुष्य एक ही मानव परिवार के अंग हैं और हमें एक-दूसरे के धर्म एवं विश्वास का सम्मान करना चाहिए। धार्मिक सद्भाव और आपसी सम्मान ही मजबूत एवं शांतिपूर्ण समाज की आधारशिला है।

लखनऊ गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष राजेन्द्र सिंह बग्गा ने सिख धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा कि गुरु साहिबानों ने मानवता की सेवा, समानता और भाईचारे का संदेश दिया है।

उन्होंने कहा कि ‘सरबत दा भला’ की भावना हमें सभी के कल्याण के लिए कार्य करने की प्रेरणा देती है। धर्मों के बीच संवाद और सहयोग से ही समाज में स्थायी शांति और सद्भाव स्थापित किया जा सकता है। इसी क्रम में

स्वामी मुक्तिनाथानन्दजी महाराज ने कहा कि हिंदू धर्म केवल किसी एक संप्रदाय, पूजा-पद्धति अथवा बाहरी आचार-विचार का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मा और परमात्मा के संबंध को जानने तथा सत्य की अनुभूति करने का मार्ग है।

स्वामी विवेकानन्द ने धर्म को केवल शब्दों, सिद्धांतों अथवा कर्मकांड तक सीमित न रखते हुए उसे जीवन में अनुभव करने और अपने आचरण में उतारने पर बल दिया था।

उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के उस महान संदेश को स्मरण कराया जिसमें उन्होंने मनुष्य को “अमृतस्य पुत्राः” अर्थात “अमृत के पुत्र” कहा था। उन्होंने बताया कि स्वामी विवेकानन्द ने मनुष्य को पापी और दुर्बल मानने के स्थान पर उसे दिव्य, शाश्वत और स्वतंत्र आत्मा के रूप में देखने का संदेश दिया।

स्वामी ने कहा कि हिंदू धर्म की विशेषता केवल सहिष्णुता नहीं, बल्कि सभी धर्मों के प्रति सम्मान तथा उनकी आध्यात्मिक सत्यता को स्वीकार करने की उदार दृष्टि है।

स्वामी विवेकानन्द ने धर्मों के बीच संघर्ष के स्थान पर “सहायता, संघर्ष नहींय समन्वय, विनाश नहींय सद्भाव और शांति, मतभेद नहीं” का आदर्श प्रस्तुत किया था।

रामकृष्ण देव के जीवन और साधना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि श्रीरामकृष्ण ने विभिन्न धार्मिक साधनाओं को स्वयं करके यह अनुभव किया कि विभिन्न मार्ग अंततः एक ही परम सत्य की ओर ले जाते हैं।

उनका प्रसिद्ध संदेश था-“यतो मत, ततो पथ”, अर्थात जितने मत, उतने पथ। यह धार्मिक समन्वय केवल सैद्धांतिक विचार नहीं था, बल्कि उनके स्वयं के आध्यात्मिक अनुभव पर आधारित था।

उन्होंने कहा कि जिस प्रकार एक ही जलाशय से विभिन्न घाटों के माध्यम से जल प्राप्त किया जाता है और अलग-अलग लोग उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं, उसी प्रकार विभिन्न धर्म एवं साधना-पद्धतियाँ परम सत्य तक पहुँचने के विविध मार्ग हैं। सत्य एक है, ज्ञानी उसे विभिन्न नामों से पुकारते हैं।

स्वामी मुक्तिनाथानन्द ने स्वामी विवेकानन्द के जीवन की विभिन्न घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उनका धर्म केवल भाषणों तक सीमित नहीं था।

वे जाति, धर्म और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का दर्शन करते थे।

माउंट आबू में एक मुस्लिम वकील के यहाँ ठहरने से लेकर एक साधारण व्यक्ति द्वारा दिए गए भोजन को सहज भाव से स्वीकार करने तक, उनके जीवन में मानव-एकता, समानता और धार्मिक समन्वय का स्पष्ट संदेश दिखाई देता है।

स्वामी ने कहा कि सच्चा हिंदू धर्म मनुष्य को विभाजित नहीं करता, बल्कि उसके भीतर निहित दिव्यता को जागृत करता है। धर्म का उद्देश्य किसी दूसरे मत को पराजित करना नहीं, बल्कि स्वयं को सत्य, प्रेम, करुणा और सेवा के माध्यम से रूपांतरित करना है।

स्वामी ने विशेष रूप से युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि स्वामी विवेकानन्द के संदेश को केवल स्मरण करने के बजाय उसे अपने जीवन में उतारना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

सत्य के प्रति निष्ठा, सभी धर्मों के प्रति सम्मान, मानव मात्र के प्रति प्रेम और सेवाकृयही आधुनिक भारत के लिए स्वामी विवेकानन्द के संदेश की सार्थक अभिव्यक्ति है।

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