उनका अंतिम लक्ष्य एक ही परम सत्य की प्राप्ति – मुक्तिनाथानन्द
धर्म का वास्तविक उद्देश्य सत्य और ईश्वर का अनुभव करना

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। सत्य पर चलने का मार्ग प्रशस्त किया गया। शुक्रवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि
रामकृष्ण परमहंस का जीवन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में धर्म-समन्वय, सहिष्णुता और प्रत्यक्ष ईश्वरानुभूति का अद्भुत उदाहरण है। उनका संदेश केवल किसी एक धर्म या संप्रदाय तक सीमित नहीं था।
उन्होंने अपने जीवन और साधना के माध्यम से यह अनुभव किया कि संसार में धर्मों के मार्ग भले ही अलग-अलग दिखाई देते हों, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य एक ही परम सत्य की प्राप्ति है।
इसी कारण उनके विचार आज भी मानव समाज में प्रेम, शांति और धार्मिक सद्भाव स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं। स्वामी ने बताया कि धर्मों की तुलना का विषय भी आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।
डॉ. महेंद्रलाल सरकार और रामकृष्ण के बीच हुई चर्चा में तुलनात्मक धर्म के अध्ययन की उपयोगिता पर प्रकाश पड़ता है। विभिन्न धर्मों का अध्ययन मनुष्य के विचारों को व्यापक बनाता है।
इससे वह अपने धर्म को ही पूर्ण और दूसरे धर्मों को गलत मानने की संकीर्णता से बच सकता है। दूसरे धर्मों की शिक्षाओं और साधना-पद्धतियों को समझने से मन में सम्मान और खुलेपन की भावना विकसित होती है।
इस प्रकार तुलनात्मक धर्म केवल बौद्धिक अध्ययन नहीं, बल्कि मनुष्य के आध्यात्मिक विकास का माध्यम भी बन सकता है। रामकृष्ण परमहंस ने स्वयं विभिन्न धार्मिक मार्गों का अभ्यास किया। उन्होंने हिंदू धर्म की अलग-अलग साधनाओं के साथ इस्लाम और ईसाई धर्म की साधना-पद्धतियों को भी अपनाया।
उनका उद्देश्य केवल धर्मों का अध्ययन करना नहीं था, बल्कि प्रत्येक मार्ग की सत्यता को अनुभव के स्तर पर समझना था। उनके अनुभव का निष्कर्ष था कि ईश्वर एक हैं, यद्यपि मनुष्य उन्हें अलग-अलग नामों और रूपों में अनुभव करता है। यही धर्मों की एकता का उनका महान संदेश था।
स्वामी ने बताया कि इस सत्य को समझाने के लिए मधुमक्खी का उदाहरण अत्यंत सुंदर है। मधुमक्खी अनेक फूलों से रस एकत्र करती है और अंत में उससे एक विशिष्ट प्रकार का मधु बनता है।
उसी प्रकार अलग-अलग धर्म अपनी-अपनी परंपराओं, साधनाओं और अनुभवों के माध्यम से मनुष्य को आध्यात्मिक सत्य की ओर ले जाते हैं।
रामकृष्ण के जीवन में विभिन्न धार्मिक अनुभवों का समन्वय इसी प्रकार एक व्यापक और हारमोनियसली विकसित आध्यात्मिक दृष्टि के रूप में दिखाई देता है। रामकृष्ण की शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पक्ष व्यावहारिक आध्यात्मिकता है।
उनके अनुसार धर्म केवल तर्क-वितर्क, पुस्तकीय ज्ञान या मतभेद का विषय नहीं है। धर्म का वास्तविक उद्देश्य सत्य और ईश्वर का अनुभव करना है। स्वामी विवेकानंद ने भी इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए धर्म को जीवन में अनुभव करने और व्यवहार में उतारने पर बल दिया।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण का संदेश आज के समय में विशेष रूप से प्रासंगिक है। धार्मिक मतभेदों और संघर्षों के स्थान पर हमें एक-दूसरे के विश्वासों को समझने और सम्मान देने की आवश्यकता है।
उनके जीवन से हमें सीख मिलती है कि रास्ते अनेक हो सकते हैं, लेकिन सत्य एक हो सकता है। जब मनुष्य संकीर्णता छोड़कर प्रेम, सहिष्णुता और प्रत्यक्ष आध्यात्मिक अनुभव की ओर बढ़ता है, तभी धर्म वास्तव में उसके जीवन को सार्थक बनाता है।



