धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को ईश्वर की ओर ले जाना- मुक्तिनाथानन्द
ईश्वर एक नाम रूप अनेक

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर प्राप्ति के लिए सत्य का मार्ग प्रशस्त किया गया।
बुधवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि धर्म का मूल उद्देश्य मनुष्य को ईश्वर की ओर ले जाना, उसके भीतर प्रेम, करुणा और सत्य का विकास करना है।
किंतु जब धर्म केवल बाहरी मत, संप्रदाय और तर्क-वितर्क तक सीमित हो जाता है, तब वही धर्म विभाजन का कारण बन सकता है।
रामकृष्ण परमहंस का जीवन और संदेश हमें इस संकीर्णता से ऊपर उठकर ईश्वर की एकता को अनुभव करने की प्रेरणा देता है। उनके अनुसार अलग-अलग धर्म, देवी-देवता और साधना-पद्धतियाँ उसी एक परम सत्य तक पहुँचने के विविध मार्ग हैं।
स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण के समय में वैष्णव और शैव जैसे संप्रदायों के बीच यह विवाद होता था कि कौन-सा देवता सर्वोच्च है।
ऐसी स्थिति में रामकृष्ण ने किसी एक मत को दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने के बजाय अनुभव के आधार पर सत्य को समझाया। उन्होंने बताया कि शिव और विष्णु अलग-अलग परम सत्यों के नाम नहीं, बल्कि उसी एक दिव्य सत्ता के विभिन्न रूप हैं।
जिस प्रकार एक ही जल को अलग-अलग स्थानों पर अलग नामों से पुकारा जा सकता है, उसी प्रकार परमात्मा को भी भक्त अपनी श्रद्धा और संस्कार के अनुसार विभिन्न नामों और रूपों में अनुभव करता है।
यही विचार उस संदेश में भी दिखाई देता है कि “ईश्वर भक्त की इच्छा के अनुसार रूप धारण करते हैं। भक्त जिस रूप में ईश्वर को प्रेमपूर्वक पुकारता है, उसी रूप में उसका मन दिव्यता का अनुभव कर सकता है।
इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति की उपासना-पद्धति को गलत या निम्न समझना आध्यात्मिक दृष्टि से उचित नहीं है। वास्तविक धर्म मनुष्य को जोड़ता है, तोड़ता नहीं। स्वामी ने समझाया कि रामकृष्ण ने धर्म को केवल बौद्धिक बहस का विषय नहीं माना।
उनके लिए धर्म का वास्तविक प्रमाण अनुभूति था। शास्त्र हमें मार्ग दिखा सकते हैं, तर्क हमें समझने में सहायता कर सकता है, लेकिन आध्यात्मिक सत्य का सबसे गहरा प्रमाण स्वयं का अनुभव है। इसी कारण उन्होंने साधना, भक्ति और ईश्वर के प्रत्यक्ष अनुभव पर बल दिया।
उनका जीवन इस बात का उदाहरण माना जाता है कि ईश्वर की खोज केवल विचारों में नहीं, बल्कि प्रेम, साधना और आत्मसमर्पण में भी की जा सकती है। उनके संदेश में प्रेम का विशेष महत्व है।
जब मनुष्य संप्रदाय, नाम और रूप के बाहरी भेदों से ऊपर उठकर प्रेम की दृष्टि से देखता है, तब उसे सभी में एक ही दिव्य चेतना का दर्शन होने लगता है। “प्रेम की अंजन” जैसी भावना का अर्थ यही है कि प्रेम की दृष्टि से देखने पर भेद कम होते जाते हैं और एकता का अनुभव गहरा होता है।
संगीत और भक्ति भी इस मार्ग के प्रभावी साधन हैं। सच्चे भाव से गाया गया भजन मन को एकाग्र कर सकता है और भीतर ईश्वर के प्रति प्रेम जगा सकता है। रामकृष्ण स्वयं भक्ति और आध्यात्मिक भावावस्था के लिए प्रसिद्ध थे। उनके जीवन से यह शिक्षा मिलती है कि साधना का उद्देश्य केवल बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि अंतःकरण का परिवर्तन है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि यह दृष्टि हमें सिखाती है कि आध्यात्मिक जीवन में विनम्रता आवश्यक है। कोई व्यक्ति अपने अनुभव को अंतिम सत्य मानकर दूसरों के मार्ग का अपमान न करे।
प्रत्येक साधक की प्रकृति अलग होती है; इसलिए उसकी साधना भी अलग हो सकती है। सम्मान और संवाद से धार्मिक एकता स्थापित होती है। धार्मिक मतभेदों को संघर्ष का कारण बनाने के बजाय हमें उनमें छिपी एकता को समझना चाहिए।
ईश्वर एक हैं, उनके नाम और रूप अनेक हो सकते हैं। जब हम पूर्वाग्रह छोड़कर प्रेम, सहिष्णुता और अनुभव की राह अपनाते हैं, तब धर्म वास्तव में मानवता की सेवा बन जाता है। यही रामकृष्ण का सार्वभौमिक संदेश है। अनेक मार्गों के पीछे एक ही सत्य है और उस सत्य तक पहुँचने का सबसे सुंदर साधन प्रेम है।



