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केवल किसी एक देवता की उपासना तक सीमित नहीं -मुक्तिनाथानन्द 

एक ही ईश्वर विभिन्न रूप धारण करते

 

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। समाज में व्याप्त नकारात्मक विचारों से निजात पाने का मार्ग प्रशस्त किया गया।

मंगलवार को प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि रामकृष्ण परमहंस का आध्यात्मिक जीवन मानवता के लिए एक महान संदेश है।

उनका मूल विचार था कि ईश्वर एक है, लेकिन मनुष्य उसे अपनी-अपनी श्रद्धा, संस्कार और आध्यात्मिक रुचि के अनुसार अलग-अलग रूपों में अनुभव करता है। स्वामी ने रामकृष्णकथामृत में वर्णित एक भक्तिगीत के माध्यम से इसी गहन आध्यात्मिक सत्य को समझाया है।

यह विषय केवल किसी एक देवता की उपासना तक सीमित नहीं है, बल्कि ईश्वर की एकता और सभी धार्मिक मार्गों की सार्थकता को सामने रखता है।

स्वामी ने समझाया कि मनुष्य की आध्यात्मिक यात्रा में इष्टदेव का विशेष महत्व है। किसी भक्त का मन माँ काली की ओर आकर्षित होता है, तो किसी का श्रीकृष्ण, श्रीराम, शिव या अन्य किसी रूप की ओर।

यह भिन्नता ईश्वर की भिन्नता नहीं, बल्कि भक्त की आंतरिक प्रकृति की भिन्नता है। यदि कोई व्यक्ति माँ काली की उपासना करना चाहता है, लेकिन उसका मन स्वाभाविक रूप से श्रीकृष्ण के रूप में ईश्वर की ओर खिंचता है, तो उसे इस बात को लेकर अपराधबोध या मानसिक संघर्ष नहीं करना चाहिए।

उसकी स्वाभाविक आध्यात्मिक प्रवृत्ति को समझना अधिक महत्वपूर्ण है। यहीं गुरु की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। गुरु साधक की प्रकृति, उसकी श्रद्धा और उसके भीतर की आध्यात्मिक प्रवृत्ति को समझकर उसके लिए उपयुक्त मार्ग और इष्टदेव की पहचान कराने में सहायता करता है।

जब साधक अपनी सहज प्रकृति के अनुरूप साधना करता है, तब उसके भीतर अनावश्यक द्वंद्व कम होता है और भक्ति अधिक सहज तथा गहरी बनती है।

स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा का एक महान पक्ष सर्वधर्मसमन्वय है। उन्होंने विभिन्न धार्मिक साधनाओं के माध्यम से यह अनुभव किया कि सत्य एक है और उसे प्राप्त करने के अनेक मार्ग हो सकते हैं।

जैसे एक ही जल को अलग-अलग स्थानों पर अलग नामों से पुकारा जा सकता है, उसी प्रकार ईश्वर को भी विभिन्न धर्म और परंपराएँ अलग-अलग नाम और रूप देती हैं। इसलिए किसी एक मार्ग को स्वीकार करने का अर्थ दूसरे मार्गों को गलत मानना नहीं है।

यह दृष्टि हमें धार्मिक संकीर्णता से ऊपर उठकर आध्यात्मिक सद्भाव की ओर ले जाती है। सच्ची भक्ति मनुष्य को विभाजित नहीं करती, बल्कि उसके भीतर प्रेम, करुणा, सहिष्णुता और एकत्व की भावना पैदा करती है। भक्त का अपने इष्टदेव के प्रति प्रेम दृढ़ हो सकता है, फिर भी उसे दूसरे भक्तों की उपासना और विश्वास का सम्मान करना चाहिए।

स्वामी ने बताया कि रामकृष्ण कथामृत में गीतों और छोटी-छोटी घटनाओं का भी विशेष महत्व है*। ये केवल साहित्यिक या मनोरंजन के साधन नहीं हैं, बल्कि उनमें गहरे आध्यात्मिक संकेत छिपे हैं।

कई बार किसी भजन या गीत को सुनकर श्रीरामकृष्ण गहन आध्यात्मिक अवस्था में चले जाते थे। इससे यह समझ आता है कि सच्ची भक्ति में शब्द, संगीत और भाव साधक के मन को ईश्वर की ओर ले जाने वाले शक्तिशाली माध्यम बन सकते हैं।

स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि ईश्वर एक है, उसके रूप अनेक हैं और मार्ग अनेक हो सकते हैं।* गुरु साधक को उसकी स्वाभाविक आध्यात्मिक दिशा पहचानने में सहायता करता है।

रामकृष्ण का सर्वधर्मसमन्वय हमें सिखाता है कि अपनी श्रद्धा में दृढ़ रहते हुए भी दूसरे मार्गों का सम्मान करना चाहिए। यही आध्यात्मिक सद्भाव, प्रेम और एकता का वास्तविक स्वरूप है।

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