मनुष्य की वास्तविक शांति ईश्वर की शरण में – मुक्तिनाथानन्द
आध्यात्मिक जीवन हमें नींद से जगाने का कार्य करता

लखनऊ, भारत प्रकाश न्यूज़। ईश्वर की शरण में जाने वास्तविक शांति का मार्ग बताया गया।
रविवार के प्रातः कालीन सत् प्रसंग में रामकृष्ण मठ अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि मनुष्य की वास्तविक शांति बाहरी संसार में नहीं, बल्कि ईश्वर की शरण में है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य अनेक इच्छाओं, अपेक्षाओं और भौतिक उपलब्धियों के पीछे दौड़ता रहता है, लेकिन इन सबके बावजूद भीतर की बेचैनी समाप्त नहीं होती। यह संदेश हमें अपने जीवन की दिशा पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
स्वामी ने कहा कि मनुष्य का जीवन अक्सर इच्छाओं के पीछे भागते हुए बीत जाता है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी जन्म ले लेती है।
हमें लगता है कि किसी वस्तु, सफलता, पद या सुविधा की प्राप्ति के बाद हमें संतोष मिलेगा, लेकिन वह संतोष बहुत देर तक टिक नहीं पाता।
स्वामी ने इसी मानवीय स्थिति को समझाने के लिए गिरिश घोष के प्रसिद्ध गीत के संदर्भ में बताया कि मनुष्य कई बार यह जाने बिना जीवन की यात्रा करता रहता है कि वह कहाँ से आया है और उसे जाना कहाँ है।
संसार की इच्छाओं की तुलना अग्नि में घी डालने से की गई है। जिस प्रकार अग्नि में घी डालने से आग शांत नहीं होती, बल्कि और प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार भौतिक इच्छाओं की पूर्ति से इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं; वे और बढ़ती जाती हैं।
स्वामी ने कहा सच्ची शांति कहाँ मिलेगी? संसार हमें सुख के अनेक साधन प्रदान कर सकता है, लेकिन स्थायी शांति केवल भौतिक उपभोग से प्राप्त नहीं हो सकती। बाहरी सुविधाएँ जीवन को सरल बना सकती हैं,जबकि मन की गहराई में स्थित असंतोष को समाप्त करने के लिए आध्यात्मिक जागृति आवश्यक है।
सच्ची शांति तब आती है जब मनुष्य अपने जीवन को ईश्वर की ओर मोड़ता है। ईश्वर को अपना सच्चा आश्रय मानकर उनकी शरण ग्रहण करना मनुष्य के भीतर स्थिरता, विश्वास और शांति का संचार करता है।
यह शरण केवल किसी कठिन परिस्थिति में सहायता मांगने तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में ईश्वर को अपने जीवन का केंद्र बनाने का भाव है।
स्वामी ने आध्यात्मिक नींद से जागने का संदेश दिया।संदेश का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि मनुष्य अक्सर ‘आध्यात्मिक नींद’ में जीवन व्यतीत करता है।
इसका अर्थ है कि हम अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर केवल बाहरी उपलब्धियों और सांसारिक आकर्षणों में उलझे रहते हैं।आध्यात्मिक जीवन हमें इस नींद से जगाने का कार्य करता है।
जब मनुष्य आत्मचिंतन करता है, ईश्वर का स्मरण करता है और अपने जीवन के अंतिम उद्देश्य को समझने का प्रयास करता है, तब उसके भीतर चेतना जागृत होती है। ईश्वर के चरणों में शरण लेने का अर्थ है अपने अहंकार, भ्रम और अस्थिरता को छोड़कर दिव्य मार्गदर्शन को स्वीकार करना।
स्वामी ने बताया कि हमें ईश्वर-केंद्रित जीवन की आवश्यकता है। इस संदेश का मूल आह्वान है कि हमारा जीवन God-Centered, अर्थात ईश्वर-केंद्रित होना चाहिए। इसका अर्थ संसार से भाग जाना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपनी चेतना को ईश्वर से जोड़ना है।
अपने कार्यों को ईमानदारी से करना, दूसरों के प्रति करुणा रखना, भक्ति का अभ्यास करना और हर परिस्थिति में ईश्वर का स्मरण बनाए रखना इसी जीवन-दृष्टि का हिस्सा है।
जब हमारा जीवन ईश्वर-केंद्रित होता है, तब कठिनाइयाँ हमें तोड़ने के बजाय हमें मजबूत और जागरूक बनाने लगती हैं। हम समझने लगते हैं कि संसार की परिस्थितियाँ परिवर्तनशील हैं, जबकि ईश्वर की शरण हमें भीतर से स्थिरता प्रदान कर सकती है।
स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि यह संदेश आधुनिक जीवन के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। यह हमें याद दिलाता है कि अनंत इच्छाओं के पीछे दौड़ना शांति का मार्ग नहीं है।
सच्ची शांति आत्म-जागरण, भक्ति और ईश्वर की शरण में है।यदि हम अपने जीवन की दिशा को भौतिक इच्छाओं से हटाकर ईश्वर की ओर मोड़ें, अपने भीतर आध्यात्मिक चेतना जगाएँ और अपने जीवन को ईश्वर-केंद्रित बनाएं, तो संसार की कठिन परिस्थितियों के बीच भी मन में शांति, संतोष और आशा का प्रकाश बनाए रखा जा सकता है।
यही इस आध्यात्मिक संदेश की सबसे सुंदर और सार्थक प्रेरणा है।



